प्रेमचंद — सूरदास की झोंपड़ी
आग और भीड़
पाठ की कथा-पृष्ठभूमि, आग का वर्णन और भीड़ के संवादों का अर्थ समझाना।
पाठ और पृष्ठभूमि. 'सूरदास की झोंपड़ी' प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' का एक अंश है। सूरदास दृष्टिहीन है, पर बेबस और लाचार नहीं। उसे अपनी गरीबी से उतना दुख नहीं, जितना भैरों और जगधर के किए अपमान और उनकी ईर्ष्या से है।
पिछली घटना. भैरों की पत्नी सुभागी मार के डर से सूरदास की झोंपड़ी में छिप गई थी। भैरों उसे मारने घुसा, पर सूरदास ने बीच-बचाव करके उसे रोक दिया। इस पर पूरे मुहल्ले में सूरदास की बदनामी हुई, और भैरों ने बदला लेने की ठान ली। उसे भड़काने में जगधर का बड़ा हाथ था, जो सूरदास के चैन से जलता था।
आग. रात के दो बजे अचानक सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। दम-के-दम में सैकड़ों लोग जमा हो गए। लपटें कभी मंदिर के स्वर्ण-कलश जैसी दिखतीं, कभी जल में चाँद के प्रतिबिंब की तरह काँपतीं। कोई पानी ला रहा था, कोई शोर मचा रहा था, पर ज़्यादातर लोग चुपचाप खड़े देखते रहे, मानो किसी मित्र की चिता जल रही हो। प्रेमचंद कहते हैं: झोंपड़े की आग, ईर्ष्या की आग की भाँति कभी नहीं बुझती।
भीड़ के संवाद. जगधर ने पूछा, सूरे, आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था क्या? नायकराम ने ताना मारा: 'चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।' यानी आग चूल्हे से नहीं, किसी दुश्मन ने लगाई है। जगधर कसमें खाकर अपनी सफ़ाई देने लगा।
सूरदास का दुख. आग बुझी, सब लोग चले गए, पर सूरदास वहीं बैठा रहा। उसे झोंपड़ी या बरतनों के जलने का दुख नहीं था; दुख था उस पोटली का, जो उसकी उम्र भर की कमाई और जीवन की सारी आशाओं का आधार थी।
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