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जयशंकर प्रसाद — देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत

जयशंकर प्रसाद

प्रसाद के जीवन, रचनाओं और दोनों गीतों के प्रसंग बताना।

कवि-परिचय. जयशंकर प्रसाद (सन् 1889-1937) का जन्म काशी में हुआ। विद्यालय में वे केवल आठवीं तक पढ़े, पर स्वाध्याय (अपने आप पढ़कर) से संस्कृत, पालि, उर्दू और अंग्रेज़ी के विद्वान बने।

रचनाएँ. वे मूलतः कवि थे: 'कामायनी', 'आँसू', 'लहर'। पर उन्होंने नाटक ('स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त'), उपन्यास और कहानियाँ भी लिखीं। उनके साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का स्वर है। यहाँ दिए दोनों गीत उनके नाटकों से हैं।

पहला गीत: देवसेना. 'स्कंदगुप्त' नाटक की देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है। हूणों से लड़ते हुए उसका पूरा परिवार वीरगति पा गया। देवसेना स्कंदगुप्त को चाहती थी, पर स्कंदगुप्त विजया को चाहते थे। अंत में जब स्कंदगुप्त ने उसे चाहा, तो देवसेना ने मना कर दिया, और जीवन के सुखों से विदा लेते हुए यह गीत गाया।

दूसरा गीत: कार्नेलिया. 'चंद्रगुप्त' नाटक की कार्नेलिया यूनानी सेनापति सिल्यूकस (सिकंदर के सेनापति) की पुत्री है। सिंधु के तट पर भारत के सौंदर्य से मुग्ध होकर वह भारत की प्रशंसा का गीत गाती है।

सार. एक गीत वेदना का है, दूसरा देशगौरव का।

दोनों गीत प्रसाद के नाटकों से हैं: एक वेदना का, एक देशगौरव का।

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