रघुवीर सहाय — वसंत आया, तोड़ो
वसंत आया
कवि को वसंत का पता कैसे चला और इसमें छिपा व्यंग्य समझाना।
थोड़ा-सा अनुभव. फुटपाथ पर चलते हुए कवि ने एक चिड़िया की आवाज़ सुनी; सूखे, पीले पत्ते पाँवों तले चरमराए; एक ताज़ी हवा आई और चली गई। वसंत का बस इतना-सा अनुभव उसे हुआ।
कैलेंडर से जानकारी. बाकी सब जानकारी उसे कैलेंडर से थी: आज मदन (कामदेव) महीने की पंचमी (वसंत पंचमी) है। दफ़्तर की छुट्टी ही इसका सबूत थी।
किताबी ज्ञान. कविताएँ पढ़कर उसे पता था कि वसंत में ढाक दहकेंगे, आम बौराएँगे, कोयल और भौंरे गाएँगे।
विडंबना. वसंत को अनुभव करने के बजाय हम उसे एक सूचना की तरह जानते हैं। यही आधुनिक जीवन की विडंबना है: ऋतुएँ बदलती रहती हैं, पर हमारी नज़र उन पर नहीं जाती।
देशज शब्द. कवि ने 'कुऊकी', 'चुरमुराए', 'पियराए' जैसे देशज (बोलचाल के) शब्दों से प्रकृति की निकटता दिखाई है।
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