सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' — बादल राग
ऐ जीवन के पारावार!
'अट्टालिका नहीं है रे आतंक-भवन' की व्याख्या करना और रूपक व विशेषण पहचानना।
आतंक-भवन. धनियों के महल, असल में 'आतंक-भवन' हैं: वे क्रांति से डरे रहते हैं। बादल की गर्जना सुनकर वे अपनी पत्नियों से लिपटकर भी काँपते हैं, और आँखें-मुँह ढाँप लेते हैं।
कीचड़ में कमल. बाढ़ हमेशा नीचे, कीचड़ पर आती है। पर उसी कीचड़ में छोटा कमल खिलकर पानी छलकाता है। रोग और शोक में भी बचपन हँसता है।
किसान की पुकार. दुबला, कमज़ोर किसान, जिसका सार (ताकत, धन) चूस लिया गया है, अधीर होकर बादल को बुलाता है: 'ऐ विप्लव के वीर!' (ऐ क्रांति के वीर!)
रूपक. कविता में रूपक भरे हैं: समीर-सागर (हवा का सागर), रण-तरी, आतंक-भवन, 'जीवन के पारावार' (जीवन का समुद्र)। पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण है।
विशेषण. विशेषण (अस्थिर सुख, दग्ध हृदय, जीर्ण बाहु, शीर्ण शरीर) चित्र को तीखा, और भाव को गहरा बनाते हैं। शोषित किसान क्रांति के बादल को पुकारता है।
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