सूरदास — पद
पहला और दूसरा पद: प्रेम से अछूते उद्धव
पहले दो पदों में उद्धव पर व्यंग्य और गोपियों की व्यथा समझाना।
'तुम बड़े भाग्यवान हो!' पहला पद शुरू होता है: 'ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।' सुनने में यह तारीफ़ है, पर है व्यंग्य। गोपियों का मतलब है: तुम कृष्ण के इतने पास रहे, फिर भी प्रेम तुम्हें छू तक नहीं गया। तुम 'स्नेह के धागे' से कभी बँधे ही नहीं। जो प्रेम जानता ही नहीं, वह विरह का दर्द कैसे समझेगा?
दो उपमाएँ. गोपियाँ उद्धव की तुलना करती हैं:
- कमल के पत्ते (पुरइनि पात) से: वह पानी में ही रहता है, पर उस पर पानी का दाग नहीं लगता;
- तेल लगी मटकी (गागरि) से: उसे पानी में डुबो दो, फिर भी एक बूँद नहीं टिकती।
ठीक वैसे ही, उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से अछूते रहे।
प्रेम की नदी. गोपियाँ कहती हैं: तुमने कभी 'प्रीति-नदी' में पाँव नहीं डुबोया, और कृष्ण के रूप पर तुम्हारी नज़र कभी नहीं अटकी। और हम? हम भोली अबला हैं, कृष्ण के प्रेम में ऐसे चिपकी हैं जैसे गुड़ से चींटी: चिपकी तो छूट नहीं सकती।
दूसरा पद: 'मन की बात मन में रह गई'. गोपियाँ अपना दुख किससे कहें? यह कहने की बात ही नहीं। अब तक वे एक आस पर जी रही थीं: कृष्ण एक दिन लौटेंगे। उसी के सहारे तन-मन का दर्द सह लिया।
योग ने आग में घी डाला. पर अब कृष्ण की जगह योग का संदेश आया। इसे सुन-सुनकर विरह की आग और भड़क गई। जहाँ से वे मदद की पुकार करना चाहती थीं, वहीं से योग की धारा बह आई। यानी जिस कृष्ण से रक्षा की उम्मीद थी, उन्हीं ने दुख भेज दिया।
'मरजादा न लही'. आखिरी पंक्ति में गोपियाँ पूछती हैं: अब हम धीरज क्यों रखें? कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा ही नहीं रखी। प्रेम का नियम है कि बदले में प्रेम मिले; पर उन्होंने प्रेम के बदले योग भेजा।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.