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तुलसीदास — राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

धनुष टूटा: राम की विनय, लक्ष्मण का व्यंग्य

राम और लक्ष्मण की प्रतिक्रियाओं की तुलना करना।

राम की विनम्रता. परशुराम गुस्से में हैं। राम शांत होकर कहते हैं: 'नाथ, शिव-धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। आप क्या आज्ञा देते हैं?' यानी वे झगड़ा बढ़ाते नहीं, नम्रता से बात सँभालते हैं।

परशुराम का जवाब. परशुराम और भड़क जाते हैं: 'सेवक वह होता है जो सेवा करे। जिसने दुश्मन जैसा काम किया, उससे तो लड़ाई ही होगी। जिसने शिव-धनुष तोड़ा, वह सहस्रबाहु जैसा मेरा शत्रु है। वह सभा से अलग हो जाए, नहीं तो सारे राजा मारे जाएँगे।'

लक्ष्मण मुसकराते हैं. यह सुनकर लक्ष्मण मुसकराकर ताना मारते हैं: 'गोसाईं, बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ (छोटे धनुष) तोड़ीं, तब तो आपने कभी ऐसा गुस्सा नहीं किया। इस धनुष पर इतनी ममता क्यों?'

परशुराम का पलटवार. परशुराम कहते हैं: 'अरे राजकुमार, तू काल के वश में है, बोलने का होश नहीं! शिव के धनुष को, जिसे सारी दुनिया जानती है, तू धनुही (बच्चों का धनुष) के बराबर बताता है?'

लक्ष्मण के तर्क. लक्ष्मण हँसकर कहते हैं:

  • हमारी समझ में सब धनुष एक जैसे हैं;
  • एक पुराना धनुष टूटने से क्या नफ़ा, क्या नुकसान?
  • राम ने तो उसे नया समझकर देखा भर था, और वह छूते ही टूट गया। इसमें राम का कोई दोष नहीं।
  • तो हे मुनि, बिना बात गुस्सा क्यों?

दो भाई, दो स्वभाव. राम: शांत, विनम्र, गुस्से को पानी की तरह ठंडा करने वाले। लक्ष्मण: निडर, तर्क करने वाले, व्यंग्य में तेज़, आग में घी डालने वाले।

राम विनम्र होकर बात सँभालते हैं; लक्ष्मण हँसकर ताना मारते हैं।

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