निराला — उत्साह, अट नहीं रही है
निराला का काव्य-शिल्प और रचना
निराला के काव्य-शिल्प की विशेषताएँ पहचानना।
भाषा. दोनों कविताएँ खड़ी बोली में हैं, ज़्यादातर तत्सम शब्दों वाली: धाराधर, निदाघ, विकल, उन्मन। दोनों संबोधन शैली में हैं: एक में कवि बादल से बात करता है, दूसरी में फागुन से।
नाद-सौंदर्य, यानी शब्दों का संगीत. इन पंक्तियों को ज़ोर से पढ़िए:
- 'घेर घेर घोर गगन': 'घ' बार-बार आकर बादलों की गड़गड़ाहट जैसा लगता है;
- 'ललित ललित', 'विकल विकल', 'उन्मन थे उन्मन';
- 'घर-घर', 'पर-पर', 'पाट-पाट'।
एक शब्द का दोहराना पुनरुक्ति है; इससे लय बनती है और भाव पक्का होता है।
मानवीकरण और प्रतीक. फागुन साँस लेता है, पंख देता है: यह मानवीकरण है। बादल क्रांति, नए जीवन और कवि का प्रतीक है।
'बाल कल्पना के-से पाले'. काले, घुँघराले बादल ऐसे लगते हैं जैसे बच्चे की कल्पना ने उन्हें पाला हो। यहाँ 'बाल' में घुँघराले बालों की झलक भी है। दोनों अर्थ सोचिए।
गाने लायक. छोटी-छोटी पंक्तियाँ, लय और तुक (गरजो-भर दो-कर दो; रही है-हट नहीं रही है) इन्हें गेय बनाती हैं।
फागुन की ऋतु. होली के आसपास प्रकृति बदलती है: आम पर बौर, लाल टेसू, पीली सरसों, कोयल की कूक। फाग और होरी इसी ऋतु के लोकगीत हैं। अपने इलाके के फागुन के रंग, खुशबू और त्योहार पर एक छोटा अनुच्छेद लिखिए।
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