पेड़ की बात
पेड़ का त्याग
पढ़ो कि लेखक पेड़ के त्याग के बारे में क्या कहते हैं।
लेख के अनुसार कोई-कोई पेड़ एक वर्ष के बाद ही मर जाते हैं, और सब पेड़ मरने से पहले अपनी संतान — बीज — छोड़ जाना चाहते हैं। लेख के अंत में लेखक ऐसे ही एक पेड़ की बात बताते हैं।
फूल में बीज बनने के बाद पेड़ अपने शरीर का रस पिलाकर बीजों का पोषण करता है। अब उसे अपनी ज़िंदगी का कोई लोभ नहीं; थोड़ा-थोड़ा करके वह संतान के लिए सब कुछ लुटा देता है। जो शरीर कुछ दिन पहले हरा-भरा था, वह अब बिलकुल सूख जाता है, और अपना ही भार उठाने की शक्ति घटने लगती है।
पहले हवा धीरे-धीरे बहती तो पत्ते उसके संग खेलते थे, और छोटी-छोटी डालियाँ ताल-ताल पर नाच उठती थीं। अब सूखा पेड़ हवा की चोट नहीं सह पाता। हवा का बस एक थपेड़ा लगते ही वह थर-थर काँपने लगता है, एक-एक करके सब डालियाँ टूट पड़ती हैं, और एक दिन अचानक पेड़ जड़ सहित भूमि पर गिर पड़ता है। इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वह पेड़ समाप्त हो जाता है।
लेखक एक कथा की याद दिलाते हैं — पारस पत्थर (स्पर्शमणि) की, जिसके छूने से लोहा सोना हो जाता है। वे कहते हैं कि माँ की ममता ही वह मणि है। पेड़ मटमैली मिट्टी से आहार और विषाक्त वायु से अंगारक लेता है, फिर भी उस पर ऐसे सुंदर फूल खिलते हैं — मानो ममता का स्पर्श पाते ही मिट्टी और अंगार फूल बन जाते हैं।
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