पहली बूँद
जलधर
जानो कि कई शब्दों की जगह एक शब्द 'जलधर' कैसे काम आता है।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 29 खोलो और 'अनेक शब्दों के लिए एक शब्द' पढ़ो। कविता 'पहली बूँद' (पृष्ठ 26) में कवि कहता है कि नीला आकाश आँखों जैसा है और ये जलधर उन आँखों की काली पुतलियों जैसे हैं। यहाँ एक नया शब्द आया है: 'जलधर'।
'जलधर' दो शब्दों से बना है: जल और धर। 'धर' का अर्थ है धारण करने वाला, यानी अपने अंदर रखने वाला। इसलिए जलधर का शाब्दिक (शब्दों वाला) अर्थ हुआ — जल को धारण करने वाला। कई शब्दों की बात एक ही शब्द में कह दी गई।
अब सोचो: जल को कौन धारण करता है? बादल भी, और समुद्र भी। दोनों में पानी भरा रहता है, इसलिए दोनों को जलधर कहा जा सकता है। तो हम कैसे जानें कि कहाँ बादल है और कहाँ समुद्र? किताब कहती है: वाक्य के संदर्भ से — यानी आस-पास की बात देखकर।
कविता में जलधर आकाश की आँखों की काली पुतलियाँ हैं, जो करुणा से आँसू बहाकर धरती की प्यास बुझाते हैं। आकाश में काले-काले, बरसने वाले — ये बादल ही हैं। इसलिए कविता में जलधर का अर्थ है बादल। 'धर' से और भी शब्द बनते हैं, जैसे 'विषधर' — विष (ज़हर) धारण करने वाला, यानी साँप; और 'धनुर्धर' — धनुष धारण करने वाला।
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