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हार की जीत

मन के भाव

पात्रों के मन में उठे भावों को पहचानो।

आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 4 'हार की जीत' में पात्रों के मन में तरह-तरह के भाव आते हैं। किताब छह भाव देती है — चकित, अधीर, डर, प्रसन्नता, करुणा और निराशा — और पूछती है कि कहानी में कौन, कब ऐसा अनुभव कर रहा था।

अधीर और चकित: जब सुलतान की प्रशंसा खड्गसिंह के कानों तक पहुँची, तो उसका हृदय घोड़े को देखने के लिए अधीर हो उठा (अधीर = जो रुक न सके, बेचैन)। फिर अस्तबल में सुलतान को देखकर वह चकित रह गया — बड़े आश्चर्य से चुपचाप खड़ा देखता रहा, क्योंकि ऐसा बाँका घोड़ा उसने कभी नहीं देखा था।

डर और प्रसन्नता: जब खड्गसिंह ने कहा कि वह यह घोड़ा बाबा के पास न रहने देगा, तो बाबा डर गए और रात-रात भर रखवाली करने लगे। कई महीने बाद, शाम को सुलतान पर घूमते हुए बाबा के मुख पर प्रसन्नता थी। और अंत में सुलतान को वापस पाकर तो वे प्रसन्नता से रो पड़े।

करुणा: पेड़ के नीचे पड़े अपाहिज ने जब बाबा को पुकारा, तो उसकी आवाज़ में करुणा थी — ऐसा दुख जो सुनने वाले के मन में दया जगा दे। (वह अपाहिज असल में खड्गसिंह था।)

निराशा: जब अपाहिज घोड़ा दौड़ा ले गया, तो बाबा के मुँह से भय, आश्चर्य और निराशा से भरी चीख निकली। और अगली सुबह अस्तबल के फाटक पर पहुँचकर जब बाबा को याद आया कि घोड़ा तो अब है ही नहीं, तो घोर निराशा से उनके पाँव भारी हो गए। पर तभी सुलतान हिनहिनाया, और उनकी निराशा खुशी में बदल गई।

कहानी में खड्गसिंह घोड़ा देखने को अधीर था और देखकर चकित हुआ; धमकी पर बाबा डरे; अपाहिज की आवाज़ में करुणा थी; घोड़ा छिनने पर और भोर में फाटक पर बाबा निराश हुए; और घोड़े पर घूमते व उसे वापस पाकर प्रसन्न हुए।

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