तीन बुद्धिमान
पिता की सलाह
लोककथा 'तीन बुद्धिमान' शुरू कीजिए और पिता की सलाह के बारे में जानिए।
'मल्हार' का दूसरा पाठ 'तीन बुद्धिमान' एक लोककथा है। लोककथा वह कहानी है जिसका लेखक पता नहीं; वह मुँह-ज़बानी, एक से दूसरे तक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आई है।
एक निर्धन (ग़रीब) व्यक्ति के तीन बेटे थे। वह अक्सर कहता: "मेरे बेटो! हमारे पास न रुपया-पैसा है, न सोना-चाँदी। इसलिए तुम्हें एक दूसरे प्रकार का धन संचित करना (जमा करना) चाहिए।"
वह धन क्या है? पिता बताते हैं: "हर वस्तु और स्थिति को पूरी तरह समझने और जानने की कोशिश करो। कुछ भी तुम्हारी नज़र से न बचे।"
"रुपये-पैसे की जगह तुम्हारे पास पैनी दृष्टि होगी, और सोने-चाँदी की जगह तीव्र बुद्धि।"
- पैनी दृष्टि = गहराई से, ध्यान से देखने की आदत
- तीव्र बुद्धि = तेज़ समझ
सोचिए: पैसा और सोना तो कोई चुरा भी सकता है, पर तेज़ बुद्धि कोई नहीं चुरा सकता! और बुद्धि जितनी इस्तेमाल करो, उतनी तेज़ होती है।
पिता का वचन: "ऐसा धन जमा कर लोगे तो तुम्हें कभी कोई कमी नहीं रहेगी, और तुम दूसरों से उन्नीस नहीं रहोगे।" (उन्नीस रहना एक मुहावरा है = किसी से कम रह जाना। बीस से एक कम!)
कुछ समय बाद पिता चल बसे (उनकी मृत्यु हो गई)। बेटों ने सोचा: "यहाँ हमारे लिए कुछ करने को नहीं। चलो, घूमकर दुनिया देखें। ज़रूरत पड़ी तो चरवाहों या खेत-मज़दूरों का काम कर लेंगे। हम भूखे नहीं मरेंगे।"
वे निकल पड़े। सुनसान घाटियाँ लाँघीं (पार कीं), ऊँचे पहाड़ पार किए, लगातार चालीस दिन चलते रहे। खाना-पीना ख़त्म हो गया, वे थककर चूर हो गए, पैरों में छाले पड़ गए। तब आख़िर उन्हें पेड़ और मकान दिखे: वे एक बड़े नगर के पास पहुँच गए थे।
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