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कबीर के दोहे

कदम मिलाकर चलना होगा

अटल बिहारी वाजपेयी की कविता 'कदम मिलाकर चलना होगा' पढ़िए।

पढ़ने के लिए. इस पाठ के साथ एक कविता है: अटल बिहारी वाजपेयी की 'कदम मिलाकर चलना होगा'। वे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री थे, और प्रसिद्ध कवि और लेखक भी।

टेक: 'कदम मिलाकर चलना होगा।' यह पंक्ति हर छंद के अंत में लौटती है।

'कदम मिलाना' = साथ-साथ चलना, एक लय में चलना। यह कविता अकेले नहीं, मिलकर चलने की बात करती है; हम कितने भी अलग हों।

पहला छंद: कठिनाइयाँ. 'बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पाँवों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ।' और फिर: 'निज हाथों से हँसते-हँसते, आग लगा कर जलना होगा।'

दूसरा छंद: जोड़े. 'हास्य-रुदन में', 'उद्यानों में, वीरानों में', 'अपमानों में, सम्मानों में'। यानी हर हाल में, अच्छा हो या बुरा।

तीसरा छंद. 'उजियारे में, अंधकार में', 'क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में'। ध्यान दीजिए: जीत क्षणिक (थोड़ी देर की) है और हार दीर्घ (लंबी)। कवि झूठी तसल्ली नहीं दे रहा।

चौथा छंद. 'सब कुछ देकर कुछ न माँगते, पावस बनकर ढलना होगा।' 'पावस' = वर्षा ऋतु। बादल सब कुछ देकर खुद समाप्त हो जाता है।

कबीर से जुड़ाव. कबीर कहते हैं: 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ… पंथी को छाया नहीं।' वाजपेयी कहते हैं: 'पर-हित अर्पित अपना तन-मन' (दूसरों की भलाई के लिए तन-मन अर्पित)। छह सौ साल का अंतर, भाषा और छंद अलग, पर बात एक: जीवन की सार्थकता दूसरों के काम आने में है।

'सब कुछ देकर कुछ न माँगते, पावस बनकर ढलना होगा': बादल सब कुछ देकर खुद समाप्त हो जाता है।

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