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लीलाधर मंडलोई — तताँरा-वामीरो कथा

पशु-पर्व और बँटा हुआ द्वीप

द्वीप के बँटने की लोककथा अपने शब्दों में सुनाना।

रोज़ की मुलाक़ात. अगले दिन वामीरो आई। दोनों रोज़ उसी जगह मिलने लगे और चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहते। बात गाँव में फैल गई।

परंपरा की दीवार. परंपरा थी कि दूल्हा-दुल्हन एक ही गाँव के हों। दोनों को समझाने की बहुत कोशिशें हुईं, पर वे नहीं माने।

पशु-पर्व. कुछ समय बाद पासा गाँव में पशु-पर्व हुआ (तगड़े पशुओं का प्रदर्शन, युवकों की ताकत की परीक्षा, गीत-संगीत)। वहाँ तताँरा को देखकर वामीरो रो पड़ी। उसकी माँ ने और गाँववालों ने सबके सामने तताँरा का अपमान किया।

क्रोध की लकीर. तताँरा क्रोध और बेबसी से भर गया। उसने किसी पर वार नहीं किया; अपनी तलवार धरती में घोंपकर पूरी ताकत से खींची। जहाँ-जहाँ लकीर बनी, धरती फटती गई, और द्वीप दो टुकड़ों में बँट गया।

बिछड़ना. तताँरा वाला टुकड़ा समुद्र में धँसने लगा; वह बहता हुआ कहीं खो गया, किसी को पता नहीं चला उसका क्या हुआ। इधर वामीरो उसी जगह जाकर घंटों बैठी रहती, उसे खोजती; उसने खाना-पीना छोड़ दिया।

अपमान से आहत तताँरा ने तलवार धरती पर चलाई, किसी इंसान पर नहीं: द्वीप दो टुकड़े हो गया।

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