मैथिलीशरण गुप्त — मनुष्यता
भाईचारा और एकता
भाईचारे और एकता की प्रेरणा को कविता के आधार पर समझाना।
देवता हाथ बढ़ाए खड़े. अनंत आकाश में देवता अपनी बाँहें फैलाए खड़े हैं, हमें उठाने को तैयार। कवि कहता है: एक-दूसरे का सहारा लेकर उठो और आगे बढ़ो।
किसी के काम आओ. ऐसे मत रहो कि तुमसे किसी का काम न बने। जीवन में कलंक (बुरा काम) न लगे, ताकि अपंक (बेदाग़) होकर ऊपर जा सको।
सब मनुष्य भाई. 'मनुष्य मात्र बंधु है।' सब इंसान भाई हैं; परमपिता एक है। कामों के कारण बाहर से हम अलग दिखते हैं, पर भीतर सब एक हैं। अगर भाई ही भाई का दुख न बाँटे, तो इससे बड़ा अनर्थ क्या?
हँसते हुए चलो. अपनी चुनी हुई राह पर हँसते-खेलते चलो; जो विघ्न (रुकावटें) आएँ, उन्हें हटाते चलो। आपस का मेल-जोल कभी न घटे, भेदभाव कभी न बढ़े। सब एक राह पर सावधान होकर साथ चलें।
'तारता हुआ तरे'. तरना यानी पार होना, सफल होना। सच्चा समर्थ वही है जो दूसरों को पार लगाते हुए खुद पार हो। सिर्फ़ अपनी नाव नहीं, सबकी नाव पार लगाओ।
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