आलो-आँधारि
माँ की याद और छपा हुआ नाम
पाठ का अंत और उसकी भाषा समझाना।
माँ की ख़बर. एक दिन बेबी के बाबा (पिता) उससे मिलने आए। तब उसे पता चला कि उसकी माँ कुछ महीने पहले चल बसी थीं, और किसी ने उसे बताया तक नहीं। बेबी को गहरा पछतावा हुआ कि वह माँ को आख़िरी बार देख भी नहीं पाई।
बदलती बेबी. अब बेबी सजने-धजने को महत्व नहीं देती; साड़ी की जगह सलवार-सूट पहनती है, अख़बार देखती है और बच्चों की पढ़ाई में मगन रहती है।
माँ से मन की बात. तातुश के घर एक साल पूरा होने पर बेबी आकाश की ओर देखकर मन ही मन माँ से कहती है: मैं अब भी पढ़ना-लिखना चाहती हूँ।
छपा हुआ नाम. एक दिन एक पत्रिका आती है जिसमें छपा है: 'आलो-आँधारि', बेबी हालदार। उसकी बेटी अक्षर जोड़-जोड़कर माँ का नाम पढ़ती है। बेबी सब भूलकर सीढ़ियाँ उतरती है और तातुश के पैर छूकर प्रणाम करती है; तातुश उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं।
- पाठ के अंत में कथा 'मैं' से बदलकर 'वह' (बेबी) में कही जाने लगती है, मानो लेखिका अपनी ही कहानी की पात्र बन गई हो।
भाषा. यह बांग्ला से सीधे हिंदी में किया गया अनुवाद है, इसलिए इसमें बांग्ला शब्द और बोलचाल की सहजता बनी रहती है: मा (माँ), बाबा (पिता), दादा (बड़ा भाई), बऊदी (भाभी), पाड़ा (मोहल्ला), दरकार (ज़रूरत), वयस (उम्र), हठात् (अचानक)।
नया उदाहरण. किसी गाँव की महिला जो कभी स्कूल नहीं जा पाई, पचास की उम्र में साक्षरता कक्षा में पढ़ना सीखे और पहली बार अपने हाथ से अपना नाम लिखे: उस पल की ख़ुशी वही है जो बेबी ने पत्रिका में अपना छपा नाम देखकर महसूस की।
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