भारतीय कलाएँ
संगीत और नृत्य
भारतीय संगीत और नृत्य की परंपरा समझाना।
वैदिक संगीत. वैदिक काल में दो तरह के संगीत का उल्लेख मिलता है:
- मार्गी: धार्मिक समारोहों से जुड़ा, नियम और अनुशासन में बँधा।
- देसी: लोक से जुड़ा, लोक-रुचि के अनुसार समूह में गाया जाने वाला।
- सामवेद में गायन के निर्देश मिलते हैं।
भारतीय संगीत की पहचान. यह सुर-ताल, राग और समय से जुड़ा है: अलग समय के अलग राग गाए जाते हैं। लोक संगीत में संस्कार-गीत (जैसे जन्म पर सोहर) और ऋतु-गीत (जैसे वर्षा में कजरी) भरपूर हैं।
लोक नृत्य (प्रायः समूह में, प्रकृति और जीवन से जुड़े):
- गिद्दा (पंजाब), घूमर (राजस्थान की महिलाओं का नृत्य), गर्बा और डांडिया रास (गुजरात), बिहू (असम), लावणी (महाराष्ट्र), छऊ (बंगाल, ओडिशा, झारखंड)।
शास्त्रीय नृत्य: कथकली और मोहिनीअट्टम (केरल), कथक, कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश), ओडिसी (ओडिशा), मणिपुरी, भरतनाट्यम (तमिलनाडु, कर्नाटक), और असम का सत्रिया, जिसे अब शास्त्रीय नृत्यों में शामिल किया गया है।
- इनका आधार अभिनय है, और सबसे आकर्षक रूप है हाथों की विभिन्न मुद्राएँ, जिनसे मनुष्य से लेकर जानवरों तक के भाव व्यक्त होते हैं।
समूह से व्यक्ति तक, फिर भी साथ. कलाएँ धीरे-धीरे समूह-कला से व्यक्ति-कला बनीं। पर लोक नृत्यों में सबका एक ताल में साथ थिरकना भारतीय संस्कृति की 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी धरती एक परिवार) की भावना दिखाता है।
नया उदाहरण. किसी स्कूल के वार्षिकोत्सव में अलग-अलग राज्यों से आए बच्चे पहले अपने-अपने लोक नृत्य करें, फिर आख़िर में सब एक ही ढोल पर मिलकर नाचें: एक ताल, अनेक कदम।
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