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हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी

बड़ौदा का बोर्डिंग स्कूल

आत्मकथा के पहले अंश और मकबूल के बचपन को समझाना।

पाठ और विधा. 'हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी' चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन की आत्मकथा का अंश है। आत्मकथा में लेखक अपने ही जीवन की कहानी कहता है। ध्यान दीजिए: यहाँ हुसैन अपने बारे में 'मैं' नहीं, 'मकबूल' कहकर लिखते हैं, मानो दूर खड़े होकर अपने बचपन को देख रहे हों।

दादा के बाद. दादा के गुज़र जाने पर मकबूल गुमसुम रहने लगा। दिनभर दादा के कमरे में बंद, उन्हीं के बिस्तर पर, उन्हीं की भूरी अचकन ओढ़कर सोता, किसी से बात नहीं करता। तब अब्बा ने उसे बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल भेजने का फ़ैसला किया, ताकि लड़कों के बीच उसका मन लगे और पढ़ाई के साथ मज़हबी तालीम और अच्छे आचरण भी सीखे।

बड़ौदा और मदरसा. बड़ौदा महाराजा सियाजीराव गायकवाड़ का साफ़-सुथरा शहर था: राजा मराठा, प्रजा गुजराती। मकबूल का छात्रावास था मदरसा हुसामिया, तालाब किनारे सुलेमानी जमात का बोर्डिंग स्कूल।

  • इसकी देख-रेख अब्बास तैयबजी करते थे, जो नेशनल कांग्रेस और गांधी जी के अनुयायी थे; इसलिए छात्र सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी का कुरता-पायजामा पहनते थे।
  • उस्ताद थे मौलवी अकबर (कुरान और उर्दू साहित्य), केशवलाल (गुजराती), स्काउट मास्टर मेजर अब्दुल्ला पठान और बैंड मास्टर गुलज़मा खान।

छह दोस्त. यहाँ मकबूल की छह लड़कों से दोस्ती हुई। दो साल की यह नज़दीकी उम्रभर दिल की दूरी में नहीं बदली, हालाँकि सब अलग-अलग दिशाओं में गए: कोई डभोई का इत्र-व्यापारी, कोई सियाजी रेडियो की आवाज़, कोई कराची का नागरिक, कोई मोती की तलाश में कुवैत, कोई बंबई की मस्जिद का मेंबर, और एक बना कलाकार (खुद मकबूल)। लेखक हर दोस्त का शब्द-चित्र देते हैं: कद, चेहरा, आदतें, शौक।

शरारत, खेल और पहली कला.

  • सालाना जलसे में फ़ोटोग्राफ़र लुकमानी केवल मेहमानों और उस्तादों की ग्रुप फ़ोटो खींच रहे थे; जैसे ही उन्होंने 'रेडी' कहा, मकबूल दौड़कर ग्रुप के कोने में खड़ा हो गया और बिना इजाज़त कई तसवीरें खिंचवा लीं।
  • खेल में हाई जंप में पहला इनाम मिला, पर दौड़ में फिसड्डी रहा।
  • ड्रॉइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर बड़ी चिड़िया बनाई; मकबूल की स्लेट पर वही चिड़िया हूबहू उतर आई: दस में से दस नंबर।
  • दो अक्तूबर को, क्लास से पहले ही, उसने ब्लैकबोर्ड पर गांधी जी का पोर्ट्रेट बना दिया; अब्बास तैयबजी बहुत खुश हुए।
  • मौलवी अकबर ने जलसे के लिए उसे 'इलम' (ज्ञान) पर दस मिनट का भाषण अभिनय के साथ याद कराया: जिसके पास हुनर का कमाल है, वह सारी दुनिया का चहेता होता है।

नया उदाहरण. जैसे किसी कक्षा में एक बच्चा गणित में औसत हो पर हर कॉपी के आख़िरी पन्ने पर कार्टून बनाता रहे, वैसे ही मकबूल का हुनर पढ़ाई और खेल के बीच से भी बार-बार झाँक जाता था।

हुनर का कमाल सारी दुनिया में।

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