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हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी

रानीपुर बाज़ार: दुकान पर बैठा कलाकार

व्यापार और कला के बीच मकबूल की धुन समझाना।

अब्बा और व्यापार. मकबूल के अब्बा (फ़िदा साहब) सर करीमभाई की 'मालवा टैक्सटाइल' मिल में टाइमकीपर थे, पर बिज़नेस में गहरी रुचि रखते थे। खुद तो अट्ठाइस साल नौकरी में बँधे रहे, इसलिए छोटे भाई मुरादअली से पहलवानी छुड़वाकर उनकी दुकानें खुलवाईं: पहले जनरल स्टोर, वह न चला तो कपड़े की दुकान, फिर तोपखाना रोड पर रेस्तराँ।

दुकान पर बैठा कलाकार. छुट्टी के दिन मकबूल को दुकान पर बिठाया जाता ताकि शुरू से व्यापार सीखे। पर उसका मन ड्रॉइंग और पेंटिंग में रहता: न चीज़ों की कीमतें याद, न कपड़ों की पहचान। हाँ, गल्ले का हिसाब सही रहता। लेखक का वाक्य याद रखने लायक है: शाम को हिसाब में दस रुपये लिखे, तो किताब में बीस स्केच किए।

स्केचों के विषय. दुकान के सामने से गुज़रने वाले लोग: घूँघट वाली स्त्री (जो साबुन लेने आती और मकबूल की नाक पकड़कर हँस पड़ती), गेहूँ की बोरी उठाए मज़दूर की पेंचदार पगड़ी, पठान की दाढ़ी, बुरके वाली औरत और बकरी का बच्चा।

फ़िल्म का पोस्टर. उस ज़माने में मूक (साइलेंट) फ़िल्मों का प्रचार ब्रास बैंड के साथ ताँगे से होता था, और रंगीन पतंग-कागज़ पर छपे पर्चे बाँटे जाते थे। एक दिन शांताराम की फ़िल्म 'सिंहगढ़' का पोस्टर आया: मराठा योद्धा, हाथ में तलवार और ढाल। मकबूल का मन किया कि इसकी ऑयल पेंटिंग बनाए, जबकि उसने अब तक केवल रंगीन चॉक या वॉटर कलर ही चलाए थे।

पहली ऑयल पेंटिंग. अब्बा तो बेटे को बिज़नेसमैन बनाना चाहते थे, रंग क्यों दिलाते! इसलिए मकबूल अलीहुसैन रंगवाले की दुकान पर गया, अपनी दो स्कूली किताबें (शायद भूगोल और इतिहास) बेचकर ऑयल कलर की ट्यूबें खरीदीं और चाचा की दुकान पर बैठकर पहली ऑयल पेंटिंग बनाई। चाचा नाराज़ हुए और शिकायत बड़े भाई तक पहुँची, पर अब्बा ने पेंटिंग देखी और बेटे को गले लगा लिया।

आज और तब. प्रचार के पुराने तरीके (ताँगा, बैंड, पर्चे) और आज के तरीके (टीवी, मोबाइल, सोशल मीडिया के विज्ञापन) बदल गए हैं, पर मकसद वही है: लोगों का ध्यान खींचना।

नया उदाहरण. किसी किराने की दुकान पर बैठी लड़की बिल तो ठीक बनाए, पर ग्राहकों की बातचीत सुनकर डायरी में छोटी-छोटी कहानियाँ भी लिखती जाए: दुकान उसकी ड्यूटी है, कहानियाँ उसकी लगन।

दस रुपये का हिसाब, बीस स्केच।

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