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हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी

बेंद्रे और अब्बा की रोशनखयाली

कला के प्रति समाज के नज़रिए और पिता के निर्णय को समझाना।

बेंद्रे से मुलाकात. एक बार मकबूल इंदौर में सर्राफ़ा बाज़ार के पास ताँबे-पीतल की दुकानों वाली गली में लैंडस्केप बना रहा था। वहीं चित्रकार बेंद्रे साहब भी मौके पर पेंटिंग करते मिले। मकबूल को उनकी तकनीक बहुत भायी: 'टिंटेड पेपर' (रंगीन चित्रकारी का कागज़) पर 'गोआश' वॉटर कलर। इसके बाद वह अकसर बेंद्रे के साथ लैंडस्केप बनाने जाने लगा।

'वैगबांड' और चाँदी का मेडल. 1933 में बेंद्रे ने घर पर कैनवस पर एक बड़ी पेंटिंग बनाई: 'वैगबांड' (आवारा)। मॉडल था उनका छोटा भाई, नौजवान पठान के कपड़ों में: सिर पर हरा रूमाल, कंधे पर कंबल, हाथ में डंडा। इस पर बंबई आर्ट सोसाइटी ने बेंद्रे को चाँदी का मेडल दिया।

  • लेखक इसे हिंदुस्तानी मॉडर्न आर्ट का शायद पहला क्रांतिकारी कदम कहते हैं, हालाँकि उसमें जोश कम और जवानी का गुलाबीपन ज़्यादा था। इससे पहले राजा रविवर्मा का पश्चिमी यथार्थवाद और गगनेंद्रनाथ टैगोर के क्यूबिस्टिक प्रयोग आए थे।
  • आगे चलकर बेंद्रे बड़ौदा की 'फ़ैकल्टी ऑफ़ फ़ाइन आर्ट' के लोकप्रिय डीन बने।

अब्बा का निर्णय. इंदौर में मकबूल का मार्गदर्शन करने वाला बेंद्रे के सिवा कोई नहीं था। एक दिन मकबूल उन्हें घर ले आया और अब्बा से मिलवाया। बेंद्रे ने मकबूल के काम पर बात की, और अगले ही दिन अब्बा ने बंबई से 'विनसर न्यूटन' के ऑयल रंग और कैनवस मँगवाने का ऑर्डर भेज दिया।

अपने समय से आगे. उस ज़माने में कला केवल राजे-महाराजों और अमीरों की दीवारों की सजावट मानी जाती थी। कपड़ा-मिलों वाले इंदौर में, काज़ी-मौलवियों के पड़ोस में, एक पिता का बेटे को कला की राह पर भेजना अचरज की बात थी। अब्बा की रोशनखयाली (खुले, उदार विचार) ने सारी रिवायती (पारंपरिक) बंदिशें तोड़ दीं, और उन्होंने कहा: 'बेटा जाओ, और ज़िंदगी को रंगों से भर दो।'

पाठ का संदेश. प्रतिभा छिपाए नहीं छिपती, और जब उसे सही अवसर (बेंद्रे जैसा मार्गदर्शक) और परिवार का साथ (अब्बा जैसा पिता) मिलता है, तो वह खिल उठती है।

नया उदाहरण. किसी गाँव का लड़का क्रिकेट में तेज़ गेंदबाज़ी करता हो; एक कोच उसे देखकर घरवालों से बात करे, और पिता खेत के काम से छुट्टी देकर उसे अकादमी भेज दें: वही बेंद्रे और वही अब्बा।

बेटा जाओ, ज़िंदगी को रंगों से भर दो।

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