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आवारा मसीहा (दिशाहारा)

'आवारा मसीहा': भागलपुर से विदा

पाठ की शुरुआत, लेखक और शरत् के पिता का परिचय देना।

पाठ और लेखक. 'आवारा मसीहा' बांग्ला के महान कथाकार शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी है। जीवनी में लेखक किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की कहानी कहता है (आत्मकथा में अपनी)। इसे विष्णु प्रभाकर (सन् 1912-2009) ने लिखा, और इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

  • विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के एक गाँव में हुआ, बचपन हरियाणा में बीता। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, जीवनी, संस्मरण लिखे और 60 से अधिक पुस्तकों का संपादन किया।
  • वे जीवनभर गांधीवादी रहे; उनके लेखन में स्वदेश-प्रेम और समाज-सुधार का स्वर है। मृत्यु के बाद उनकी इच्छा के अनुसार उनका शरीर एम्स, दिल्ली को चिकित्सा-शोध के लिए दान कर दिया गया।

भागलपुर से विदा. पाठ की शुरुआत भावुक है। भागलपुर छोड़ने से पहले शरत् अपने हमउम्र मामा सुरेंद्र के साथ पुराने बाग में जाकर जैसे पेड़ों से विदा लेता है। वह लगातार बातें करता रहता है ताकि दुख छिपा रहे, और सुरेंद्र को पेड़ पर कमर बाँधकर सोने का तरीका भी बताता है।

नाना का घर. शरत् लगभग तीन वर्ष से नाना केदारनाथ के घर रह रहा था। जब वह पहली बार आया था, तो उस पर धन और गहनों की वर्षा हुई थी, क्योंकि वह उस पीढ़ी का पहला लड़का था।

पिता मोतीलाल. शरत् के पिता मोतीलाल यायावर (घुमक्कड़), स्वप्नदर्शी और कला-प्रेमी थे।

  • कोई नौकरी उनके पास टिकती नहीं थी।
  • कोई रचना पूरी नहीं होती थी: कहानियाँ अधूरी रह जातीं; उन्होंने भारत का मानचित्र बनाना शुरू किया, पर यह सोचकर छोड़ दिया कि उसमें हिमालय (हिमाचल) की गरिमा ठीक से नहीं उतर पाएगी।
  • इसी कारण माँ भुवनमोहिनी परिवार को लेकर अपने पिता के घर, भागलपुर आ गईं।

नया उदाहरण. कोई लड़का बहुत सुंदर गिटार बजाना शुरू करे, फिर पेंटिंग, फिर कविता, पर हर काम आधा छोड़ दे क्योंकि उसे लगे कि वह 'पूरा सुंदर' नहीं बनेगा: प्रतिभा भरपूर, पर पूर्णता के डर से अधूरापन। मोतीलाल ऐसे ही थे।

आवारा भी, मसीहा भी।

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