आवारा मसीहा (दिशाहारा)
भागलपुर: कठोर पढ़ाई और दलपति शरत्
उस समय की शिक्षा और शरत् के नेतृत्व व शौकों को समझाना।
कठोर पढ़ाई. भागलपुर में शरत् का दाखिला दुर्गाचरण स्कूल की छात्रवृत्ति कक्षा में सीधे हुआ। किताबें कठिन थीं और रोज़ पंडित के सामने परीक्षा होती। लेखक कहते हैं, शरत् का साहित्य से पहला परिचय आँसुओं से हुआ। फिर भी मेहनत से वह अच्छे बच्चों में गिना जाने लगा।
घर का अनुशासन. घर पर पढ़ाने वाले अक्षय पंडित मानते थे कि 'विद्या का निवास डंडे में' है। नाना के बाहर जाते ही बच्चे गाते: 'कैट इज़ आउट, लेट माउस प्ले'। एक बार स्कूल की घड़ी आगे करके जल्दी छुट्टी करवाने का 'नाटक' हुआ, जिसका निर्देशक शरत् था, पर वह पकड़ा नहीं गया।
गांगुली परिवार के नियम. नाना के परिवार में बच्चों को केवल पढ़ने का अधिकार था। पतंग, लट्टू, गुल्ली-डंडा सब वर्जित। सज़ा में एक पैर पर खड़ा करना या गोदाम-अस्तबल में बंद करना। पर बड़ों की आँखों में धूल झोंकने में शरत् निपुण था। लेखक का भाव यही है: जितना कठोर निषेध, उतना गहरा विद्रोह।
शरत् के शौक:
- तितलियाँ पालना, काठ के बक्से में; इस 'तितली-सेना' में नौकरों के बच्चे भी बराबरी से साथी थे।
- उपवन लगाना और काँच से ढकी छोटी तलैया बनाना।
- पतंग (उसका माँझा 'विश्वजयी' था) और लट्टू।
- पढ़ने का कमरा भी बहुत सुंदर ढंग से सजाया हुआ।
दलपति शरत्. वह अपरिग्रही था, यानी चीज़ें जमा करके नहीं रखता था: दिनभर में जीती हुई गोलियाँ और लट्टू शाम को छोटे बच्चों में बाँट देता। उसने एक खंडहर महल में छिपकर अखाड़ा और बाँस का 'पैरेलल बार' भी बनवाया।
नया उदाहरण. जिस हॉस्टल में मोबाइल पूरी तरह मना हो, वहाँ बच्चे छिपकर उसे इस्तेमाल करने के नए-नए तरीके खोज लेते हैं: बहुत सख़्त पाबंदी अकसर चोरी-छिपे रास्ते पैदा करती है।
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