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आवारा मसीहा (दिशाहारा)

तपोवन, संवेदना और साहित्य की पहली गोष्ठी

शरत् के भीतर के लेखक के जागने को समझाना।

शरत् का 'तपोवन'. शरारतों के बीच शरत् कभी-कभी गायब हो जाता। वह जाता अपने 'तपोवन' में: गंगा किनारे नीम, करौंदे और लताओं से घिरी एक छिपी जगह, जहाँ पत्तों से हरी रोशनी छनकर आती थी। उसने यह रहस्य केवल सुरेंद्र को बताया, और वह भी सूर्य, गंगा और हिमालय की शपथ दिलाकर।

  • लेखक कल्पना करते हैं कि वहीं उसने प्रण किया होगा: सौंदर्य की उपासना करना, अन्याय से लड़ना, और कभी छोटा काम न करना।
  • पढ़ाई में भी चमका: अंकगणित में सौ में सौ पाए और अंग्रेज़ी स्कूल में प्रथम आया।

सच्चा दुख. एक टूटे घर से धीमी रुलाई सुनकर शरत् ने समझाया कि जो सचमुच दुखी होते हैं, वे दिखावे के लिए ज़ोर से नहीं रोते। यह सुनकर अघोर बाबू के एक मित्र ने कहा: यह बालक मन की गहराइयाँ समझने में प्रसिद्ध होगा।

नए युग की हवा. नाना का परिवार कट्टर था: वहाँ किशोर बंकिम और रवींद्र की किताबें भी चोरी-छिपे पढ़ते थे। फिर भी उसमें नई हवा लाने वाले दो लोग थे:

  • अमरनाथ, जो चोरी-छिपे 'बंगदर्शन' पत्रिका लाते।
  • कुसुमकामिनी, जो स्वयं पढ़ी-लिखी थीं (छात्रवृत्ति परीक्षा पास करके ईश्वरचंद्र विद्यासागर के हाथों पारितोषिक पाया था) और अपनी बैठक में 'बंगदर्शन', 'मेघनाद वध', 'नीलदर्पण' जैसी रचनाएँ पढ़कर सुनाती थीं। लेखक कहते हैं: शरत् की असली शिक्षा का आदि पर्व इसी 'पाठशाला' में शुरू हुआ।

रवींद्रनाथ से परिचय. 'बंगदर्शन' में रवींद्रनाथ ठाकुर का उपन्यास 'आँख की किरकिरी' पढ़कर शरत् को गहरा आनंद मिला; रवींद्रनाथ जीवनभर उसके गुरु जैसे रहे। उनकी रचना 'प्रकृतिर प्रतिशोध' सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

नया उदाहरण. किसी मोहल्ले की एक दीदी हर शाम बच्चों को कहानियाँ पढ़कर सुनाए, और उन्हीं में से एक बच्चा आगे चलकर लेखक बने: स्कूल की परीक्षा नहीं, ऐसी बैठकें ही अकसर पढ़ने का प्रेम जगाती हैं।

सच्चा रोना और दिखावटी रोना।

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