आवारा मसीहा (दिशाहारा)
देवानंदपुर: पाठशाला, धीरू और नयन बागदी
शरत् के बचपन के अनुभवों और उनके साहित्य से संबंध को समझाना।
प्यारी पंडित की पाठशाला. देवानंदपुर में पाँच वर्ष की उम्र में शरत् प्यारी पंडित की पाठशाला गया। शरारत में उसने पंडित जी की चिलम में तंबाकू की जगह ईंट के टुकड़े भर दिए। माँ से मार पड़ती, पर दादी कहतीं: 'एक दिन यह बहुत बड़ा आदमी होगा।'
धीरू. बचपन की संगिनी धीरू उसे करौंदों की माला बनाकर देती। एक बार शरत् ने भोलू को चूने के ढेर में गिरा दिया और भाग गया; तब धीरू उसके लिए आँचल में मूड़ी (मुरमुरे) छिपाकर लाई। दोनों झगड़ते भी, पर दोस्ती गहरी होती गई।
- लेखक कहते हैं: 'देवदास' की पारो, 'बड़ी दीदी' की माधवी, और 'श्रीकांत' की राजलक्ष्मी: इन नायिकाओं में धीरू का ही विकसित रूप है।
संगीत और घुमक्कड़ी. मधुर कंठ के कारण शरत् यात्रादल (लोकनाटक मंडली) में शागिर्दी करता; डोंगी खेकर कृष्णपुर के अखाड़े में कीर्तन सुनने पहुँच जाता। पिता को डेहरी-ऑन-सोन में नौकरी मिली तो कुछ दिन वह भी वहाँ रहा; वे दिन उसके उपन्यास 'गृहदाह' में अमर हो गए।
नयन बागदी के साथ. एक बार शरत् नयन बागदी के साथ बसंतपुर गया। लौटते समय अँधेरे जंगल में लुटेरों ने एक भिखारी की जान ले ली। नयन ने एक लुटेरे को पकड़ लिया और शरत् से कहा कि उसे मारे। पहले 'मारने' की बात उसे रोमांचक लगी थी, पर सामने डरा, भूखा, रोता आदमी देखकर उसके हाथ-पैर काँप गए और उसने मना कर दिया। यह प्रसंग उस समय के डर (पुलिस तक का) और शरत् की करुणा दोनों दिखाता है।
नया उदाहरण. मोहल्ले में किसी चोर को पकड़कर भीड़ उसे पीटने लगे, और एक किशोर आगे बढ़कर कहे, 'इसे पुलिस को सौंपो, मारो मत': गुस्से के बीच इंसानियत को याद रखना ही शरत् का स्वभाव था।
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