प्रेमचंद — सूरदास की झोंपड़ी
खेल में रोना कैसा?
सुभागी का निश्चय, सूरदास का 'सच्चा खिलाड़ी' वाला बोध और 'सौ लाख बार बनाएँगे' का अर्थ समझाना।
सुभागी का प्रण. सुभागी को गहरा दुख था कि उसके कारण सूरदास का सर्वनाश हुआ। उसने प्रण किया कि वह भैरों के घर रहकर ही उसकी थैली लौटवाएगी।
सूरदास की बेबसी. सूरदास सोचता है: रुपये मैंने ही कमाए थे, फिर कमा लूँगा। पर सुभागी पर लगे कलंक और अपनी बेबसी से वह रो पड़ा।
'खेल में रोते हो!' तभी मिठुआ घीसू के घर से रोता हुआ आया (शायद घीसू ने उसे मारा था), और घीसू उसे चिढ़ा रहा था: 'खेल में रोते हो!' यह सुनकर सूरदास को जैसे ज्ञान मिल गया। जीवन भी एक खेल है, और सच्चे खिलाड़ी हारकर रोते नहीं; वे फिर खेलते हैं।
विजय की उमंग. सूरदास उठा, और विजय की उमंग में राख को उड़ाने लगा, मानो दुख को झाड़ रहा हो। मुहल्ले के लड़के भी इस खेल में जुट गए।
सौ लाख बार. मिठुआ ने पूछा, अगर कोई सौ लाख बार आग लगा दे तो? सूरदास ने दृढ़ता से कहा: 'तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।' यही सूरदास की महानता है: बदला नहीं, पुनर्निर्माण।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.