विश्वनाथ त्रिपाठी — बिस्कोहर की माटी
कमल, कोइयाँ और हरसिंगार
कमल-ककड़ी, कोइयाँ, सिंघाड़ा और हरसिंगार के वर्णन से गाँव और प्रकृति का संबंध समझाना।
पाठ और लेखक. 'बिस्कोहर की माटी' विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा 'नंगातलाई का गाँव' का अंश है। इसमें 'बिसनाथ' स्वयं लेखक हैं, और बिस्कोहर उनका गाँव। लेखक अपने बचपन के गाँव को याद करते हैं, जहाँ प्रकृति, बोली और जीवन एक-दूसरे में घुले हुए थे।
कमल और पुरइन. गाँव के पोखर में कमल खिलते थे। भोज के समय खाना कमल के पत्तों (पुरइन) पर परोसा जाता था। अकाल पड़ने पर लोग कमल की जड़, कमल-ककड़ी (भसीण), खोदकर खाते थे।
कोइयाँ. पर कमल से भी ज़्यादा बहार कोइयाँ (कुमुद) की थी। शरद ऋतु में यह हर पानी भरे गड्ढे में खिल उठती है।
सिंघाड़े का तालाब. सिंघाड़े के उजले फूलों वाले तालाब से बिसनाथ को गंध के साथ एक हल्की आवाज़ भी सुनाई देती थी। बच्चे प्रकृति को केवल देखते नहीं थे; उसे सूँघते, सुनते और महसूस करते थे।
हरसिंगार. पितृपक्ष में मालिन दाई दरवाज़े पर हरसिंगार के फूलों का ढेर रख जाती थीं। गाँव के बच्चे प्रकृति को छूते, पहचानते और उससे बतियाते थे।
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