प्रभाष जोशी — अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में
प्रभाष जोशी और मालवा
प्रभाष जोशी की विशेषताएँ और पाठ की 'पहले के मालवा' और 'अब के मालवा' वाली तुलना बताना।
लेखक. प्रभाष जोशी का जन्म इंदौर में हुआ। उन्होंने 'नयी दुनिया' के संपादक राजेंद्र माथुर के साथ पत्रकारिता शुरू की।
जनसत्ता. उनके संपादन में 'जनसत्ता' अख़बार निकला, जिसने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाई दी। 'कागद कारे' उनका नियमित स्तंभ (कॉलम) था।
उनकी भाषा. उन्होंने बोलचाल और देशज (स्थानीय) शब्दों से पत्रकारिता को नया तेवर दिया। वे केवल राजनीति पर नहीं, क्रिकेट और संगीत (जैसे कुमार गंधर्व) पर भी लिखते थे, और गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के आदर्शों में विश्वास रखते थे।
यह पाठ. 'अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में' उनके स्तंभ 'कागद कारे' से लिया गया है। इसमें मालवा की मिट्टी, वर्षा, नदियाँ और वहाँ के लोगों का जीवन है।
कल और आज का मालवा. पहले के मालवा के बारे में कहावत थी: 'मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर'। पर अब वह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में फँसकर सूखने लगा है। लेखक की चिंता केवल मालवा की नहीं, पूरी दुनिया के पर्यावरण की है।
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