प्रभाष जोशी — अपना मालवा—खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में
भरी-पूरी नदियाँ
नर्मदा, शिप्रा, चंबल और यशवंत सागर के वर्णन से मालवा का भूगोल और लोक-आस्था समझाना।
मालवा की यात्रा. लेखक नवरात्रि की पहली सुबह मालवा पहुँचे। चौमासा (बरसात के चार महीने) जाते-जाते भी आसमान में बादल छाए थे, और हर नदी-नाला बह रहा था।
नागदा और उज्जैन. नागदा में मीणा जी ने बताया कि ज़्यादा बारिश से सोयाबीन गल गई, पर अब गेहूँ और चना अच्छा होगा, क्योंकि ज़मीन में नमी है। उज्जैन में शिप्रा नदी बरसों बाद भरपूर दिखी।
नर्मदा. ओंकारेश्वर में नर्मदा पर बाँध बन रहा था। मशीनों और निर्माण के बीच वह नदी लेखक को चिढ़ी हुई बहती लगी। नेमावर में वही नर्मदा शांत, गंभीर और माँ जैसी लगी।
नदियों के स्रोत. चंबल जानापाव पर्वत से निकलकर इटावा के पास यमुना में मिलती है। शिप्रा केवड़ेश्वर से निकलती है।
पग-पग नीर. इस बार इतना पानी बरसा कि गांधी सागर बाँध के सारे दरवाज़े खोलने पड़े, और यशवंत सागर के साइफ़न चल पड़े। पुरानी कहावत 'पग-पग नीर' फिर सच हो गई। जब तक नदी बारहों महीने बहती है, तब तक जीवन का स्रोत भी जीवित रहता है।
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