देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार
हँसी की चोट
सवैये का अर्थ और विप्रलंभ शृंगार समझाना।
सवैया: 'हँसी की चोट'. एक दिन कृष्ण मुसकराकर मुँह फेर गए; उसी 'हँसी की चोट' से गोपी विरह में डूबी है। देव दिखाते हैं कि विरह में उसके शरीर के पंच तत्त्व (वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश) एक-एक कर कैसे चले गए:
- 'साँसनि ही सौं समीर गयो': लंबी-लंबी आहों के साथ वायु चली गई।
- 'आँसुन ही सब नीर गयो ढरि': आँसुओं के साथ सारा जल बह गया।
- 'तेज गयो गुन लै अपनो': तेज (अग्नि) अपना गुण लेकर चला गया; शरीर की चमक और गरमी नहीं रही।
- 'भूमि गई तन की तनुता करि': पृथ्वी तत्त्व भी शरीर को दुबला करके चला गया।
- अब बस आकाश बचा है, और वह भी कृष्ण से मिलने की आशा से भरा है। देव कहते हैं, वह मिलने की आस में ही जी रही है।
अलंकार और छंद.
- 'हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि': हरि (कृष्ण) ने एक नज़र (हेरि) में हृदय हर (हरि) लिया। एक ही शब्द 'हरि' के दो अर्थ: यह यमक अलंकार है।
- 'साँसनि ही सौं समीर' जैसी पंक्तियों में एक ही ध्वनि (स) की आवृत्ति: अनुप्रास।
- छंद सवैया है, भाषा ब्रज; ध्वनियाँ इसे संगीतमय बनाती हैं।
नया उदाहरण. किसी गहरे दुख में कोई व्यक्ति कहे कि 'भूख गई, नींद गई, चेहरे की रौनक गई, बस एक उम्मीद बची है': देव ने यही बात पंच तत्त्वों के सुंदर रूपक में कही है।
पाँच में से बस आकाश बचा: आशा का।
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