देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार
दरबार
दरबारी संस्कृति पर व्यंग्य समझाना।
सवैया: 'दरबार'. इसमें देव उस समय के सामंती दरबारों पर तीखा व्यंग्य करते हैं।
- 'साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी': राजा (साहिब) अंधा है, उसके दरबारी (मुसाहिब) गूँगे, और पूरी सभा बहरी। वहाँ बस 'रंग रीझ को माच्यो': भोग-विलास और मौज-मस्ती का शोर मचा है।
- ऐसे दरबार में आया व्यक्ति (कवि-कलाकार) रास्ता भूलकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों में भटकता है; डूबने से बचाने वाला कोई अच्छा कर्म भी नहीं बचा।
- वहाँ न उसका वेश कोई देखता है, न उसकी कही बात कोई समझता है, न बताई बात कोई सुनता है: सब अपनी ही रुचि में डूबे हैं।
अंतिम पंक्ति. 'देव तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो': ऐसे दरबार में वह कवि, भटके हुए नट (नाचने वाले) की तरह, बिगड़ी बुद्धि से पूरी रात नाचता रहा। यानी जहाँ कला की परख करने वाला कोई न हो, वहाँ कला व्यर्थ है। इसमें देव का अपने ऊपर आत्म-व्यंग्य भी है, क्योंकि उन्होंने स्वयं कई दरबार देखे थे।
- यह अनुभव से उपजा व्यंग्य है, कुछ-कुछ भारतेंदु की 'अंधेर नगरी' जैसा।
नया उदाहरण. कोई गायक ऐसी पार्टी में गाए जहाँ सब मोबाइल में लगे हों, शोर कर रहे हों, कोई सुन ही न रहा हो, और फिर भी उसे पूरी रात गाना पड़े: मेहनत बहुत, क़द्र शून्य।
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