सुमित्रानंदन पंत — संध्या के बाद
लाला का मन और समानता का सपना
कविता के सामाजिक संदेश और व्यंग्यपूर्ण अंत को समझाना।
लाला का मन. एक लाला (परचून का छोटा दुकानदार) अपना हिसाब-किताब भूलकर सोचने लगता है। उसे अपनी छोटी-सी परचून की ढेरी तुच्छ लगती है, और उसके भीतर का 'मानव' जाग उठता है।
उसका जीवन. दीनता, दुख, अपमान, ग्लानि, अधूरी भूख-प्यास, मरी हुई इच्छाएँ। दिन भर गद्दी पर बैठे, कौड़ी-कौड़ी के लिए झूठ बोलना पड़ता है, फिर भी न परिवार ठीक से पलता है, न पक्का घर बनता है।
उसके प्रश्न. वह सोचता है: शहरी बनियों की तरह वह महाजन क्यों नहीं बन पाता? किसने उसकी उन्नति के साधन रोके? क्या यह व्यवस्था बदल नहीं सकती?
समानता का सपना. वह एक नई दुनिया की कल्पना करता है:
- कर्म और गुण के अनुसार आय का बँटवारा;
- सामूहिक जीवन, और शोषण से मुक्ति;
- धन पर समाज का अधिकार हो;
- 'दरिद्रता पापों की जननी': गरीबी ही पापों को जन्म देती है; दोष व्यक्ति का नहीं, जग की परिपाटी (व्यवस्था) का है।
व्यंग्य भरा अंत. तभी एक बुढ़िया आध पाव आटा लेने आती है, और 'लाला ने फिर डंडी मारी': उसने फिर कम तौल दिया! सपना टूट जाता है; डालों में घुग्घू (उल्लू) चीख़ उठता है, और गहरी आलसी नींद का अजगर पूरी बस्ती को निगल लेता है। व्यवस्था दोषी है, पर उसी व्यवस्था में पिसता लाला भी अपने से कमज़ोर का शोषण करने से नहीं चूकता।
नया उदाहरण. कोई कर्मचारी दिनभर अपनी कंपनी के अन्याय की शिकायत करे, पर शाम को घर लौटते समय रिक्शेवाले से दस रुपये पर घंटों मोल-भाव करे: बड़ा अन्याय दिखता है, अपना छोटा अन्याय नहीं।
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