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महादेवी वर्मा — जाग तुझको दूर जाना

बाधाएँ भीषण भी, कोमल भी

बाधाओं के प्रतीक और जागरण का संदेश समझाना।

आलस का क्षण. 'चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!': जो आँखें सदा सजग रहती थीं, वे आज नींद से भारी हैं, और वेश अस्त-व्यस्त है। कवयित्री पुकारती हैं: 'जाग तुझको दूर जाना!'

भीषण बाधाएँ. रास्ते में भयंकर कठिनाइयाँ आ सकती हैं:

  • अचल हिमालय (हिमगिरि) के हृदय में कंपन हो जाए;
  • प्रलय के आँसुओं में आकाश चुपचाप रोए;
  • प्रकाश को पीकर घना अँधेरा डोलने लगे;
  • बिजली की लपटों में निर्दय तूफ़ान गरजे।
  • फिर भी: 'पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!': विनाश के रास्ते पर भी अपनी छाप छोड़ते हुए आगे बढ़ना है।

कोमल बाधाएँ. सबसे कठिन बाधाएँ कभी-कभी सुंदर होती हैं:

  • 'मोम के बंधन सजीले': मोह और सुख के सुंदर, कोमल बंधन;
  • 'तितलियों के पर रंगीले': रंग-बिरंगे आकर्षण;
  • 'मधुप की मधुर गुनगुन': भौंरे की मीठी गुनगुन, जो दुनिया का दुख भुला दे;
  • 'फूल के दल ओस-गीले': ओस से भीगी पंखुड़ियाँ, यानी आराम और सुख।
  • 'तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!': अपनी ही छाया (स्वार्थ, आत्म-मोह) को अपने लिए कैद मत बना लेना।

नया उदाहरण. कोई खिलाड़ी चोट और हार से नहीं डरता, पर टीम में चुने जाने के बाद मिली तारीफ़, पार्टियों और आराम में अभ्यास छोड़ बैठे: कभी-कभी तूफ़ान से ज़्यादा ख़तरनाक तितलियाँ होती हैं।

न तूफ़ान से डरना, न तितलियों में उलझना।

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