धूमिल — घर में वापसी
पाँच जोड़ी आँखें
रूपकों के माध्यम से परिवार की दशा समझाना।
'मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं'. कवि परिवार के पाँच सदस्यों को उनकी आँखों से पहचानता है, क्योंकि आँखें वह कह देती हैं जो ज़ुबान नहीं कहती। हर आँख एक रूपक है:
- माँ की आँखें: 'पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिए': मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही रुक गईं; अधूरी इच्छाएँ, थकी हुई उम्मीद।
- पिता की आँखें: 'लोहसाँय की ठंडी शलाखें': लोहार की भट्ठी (लोहसाँय) की सलाखें जो कभी तपती थीं, अब ठंडी पड़ गईं; जोश और ताकत बुझ गई।
- बेटी की आँखें: 'मंदिर में दीवट पर जलते घी के दो दिए': पवित्रता, मासूमियत और जीवन की उजली आशा।
- पत्नी की आँखें: 'आँखें नहीं, हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं': उसकी नज़र ही कवि का मौन सहारा है, जो उसे गिरने नहीं देती।
गरीबी की दीवार. 'वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं / बीच की दीवार के दोनों ओर / क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं।' परिवार के लोग अपने हैं, पास हैं, फिर भी उनके बीच एक दीवार है: गरीबी की। 'पेशेवर गरीब' का व्यंग्य यह है कि गरीबी मानो उनका स्थायी धंधा बन गई है, जिससे वे निकल ही नहीं पाते।
नया उदाहरण. किसी कारखाने का मज़दूर शाम को घर आए; पत्नी बिना कुछ कहे पानी का गिलास थमा दे, उसकी आँखों में बस इतना हो कि 'मैं हूँ': शब्द नहीं, वही नज़र सहारा बन जाती है।
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