दोपहर का भोजन
आधी रोटी: कहानी का अंत
कहानी के अंत और गरीबी की विवशता को समझाना।
बेमेल बातचीत. खाते समय मुंशी जी और सिद्धेश्वरी बारिश, मक्खियों, किसी बीमार फूफा, किसी की बेटी की शादी की बातें करते हैं। असली चिंता (घर कैसे चलेगा) पर कोई नहीं बोलता: बातें जितनी इधर-उधर की हैं, डर उतना ही गहरा है।
कसम और गुड़ का रस. सिद्धेश्वरी 'बड़का की कसम' देकर एक और रोटी का आग्रह करती है। मुंशी जी कहते हैं कि अन्न से तबीयत ऊब गई है; कसम रखने के लिए वे गुड़ का ठंडा रस माँग लेते हैं, क्योंकि रोटियाँ हैं ही नहीं।
माँ का हिस्सा. अंत में सिद्धेश्वरी के लिए बचता है: अधूरा कटोरा दाल, थोड़ी तरकारी और एक मोटी, जली हुई रोटी। उसमें से भी वह आधी रोटी सोए हुए प्रमोद के लिए रख देती है।
- पहला कौर मुँह में रखते ही उसकी आँखों से आँसू टपकने लगते हैं: कहानी का सबसे मार्मिक क्षण।
आख़िरी वाक्य. कहानी का अंतिम वाक्य सब बदल देता है: डेढ़ महीने पहले मुंशी जी की मकान-किराया नियंत्रण विभाग की क्लर्की से छँटनी हो चुकी है। फिर भी वे ऐसे निश्चिंत सो रहे हैं जैसे कोई चिंता न हो। अब समझ आता है कि रोटियाँ क्यों गिनी-चुनी थीं, और हर कोई झूठ क्यों बोल रहा था।
नया उदाहरण. कोई फ़िल्म आख़िरी दृश्य में बताए कि जिसे हम पूरी फ़िल्म में ख़ुश समझ रहे थे, वह असल में सब खो चुका था: दर्शक पीछे मुड़कर हर दृश्य को नए अर्थ में देखने लगता है। अमरकांत का अंतिम वाक्य यही करता है।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.