टार्च बेचनेवाले
दो धंधे, एक 'टार्च'
आस्था के बाज़ारीकरण पर रचना का संदेश समझाना।
बँगले में बातचीत. दोस्त के आलीशान बँगले का वैभव देखकर विक्रेता पूछता है: पाँच साल में इतनी दौलत कैसे? दोस्त भारी-भरकम 'फ़िलॉसफ़ी' बोलने लगता है: 'परिवर्तन जीवन का अनंत क्रम है।'
विक्रेता का तर्क. विक्रेता उसे रोककर सीधी बात कहता है:
- मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू रहस्यमय ढंग से; पर दोनों लोगों को अँधेरे का डर दिखाते हैं।
- जो भी डर दिखाए, समझ लो वह अपनी कंपनी की टार्च बेचना चाहता है।
- ऐसे लोग कभी नहीं कहते कि दुनिया में प्रकाश फैला है, क्योंकि तब उनकी 'टार्च' नहीं बिकेगी।
दोस्त की स्वीकारोक्ति. दोस्त मान जाता है: 'मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है।' उसकी टार्च की कोई दुकान नहीं; वह 'बहुत सूक्ष्म' है, दिखती नहीं, पर उसकी कीमत बहुत मिलती है।
अंत. दो दिन बाद विक्रेता 'सूरज छाप' टार्च की पेटी नदी में फेंक देता है। वह अपनी दाढ़ी सहलाते हुए कहता है: 'धंधा वही करूँगा ... बस कंपनी बदल रहा हूँ।' यानी अब वह भी 'संत' बनकर वही डर बेचेगा।
संदेश. परसाई चेताते हैं: डर दिखाकर कोई कुछ बेचे, चाहे टार्च हो या 'आत्मा का प्रकाश', तो सावधान रहना चाहिए। सच्ची आस्था डर पर नहीं, समझ पर टिकती है।
नया उदाहरण. कोई व्यक्ति इंटरनेट पर बार-बार लिखे कि 'दुनिया खत्म होने वाली है', और हर पोस्ट के नीचे अपनी 'बचने की किताब' का लिंक दे: जो डर बेचता है, वह अपनी 'टार्च' भी बेचता है।
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