गूँगे
घर से निकाला जाना और 'गूँगे' का बड़ा अर्थ
कहानी के अंत और शीर्षक के व्यापक अर्थ को समझाना।
मौन विरोध. चमेली बासी रोटी लेकर उसे पुकारती है। वह आता है, पर आँखों में शिकायत लिए: यह पक्षपात का मौन विरोध है। रोटी लेते हुए उसकी हँसी भी अजीब, गुर्राहट जैसी लगती है।
शक और निकाला जाना. घर में चोरी के शक पर वह सिर झुका लेता है। चमेली सोचती है, यह कौन-सा अपना है? और गुस्से में उसे 'मक्कार', 'बदमाश' कहकर निकल जाने को कहती है।
- वह कुछ नहीं सुनता, मूर्ति की तरह चुप खड़ा रहता है। चमेली को अपनी मूर्खता पर शर्म भी आती है (वह तो सुन ही नहीं सकता!), फिर भी वह उसे धक्का देकर बाहर कर देती है।
चोट खाकर लौटना. घंटे भर बाद वह चोटिल होकर लौटता है: सड़क के लड़कों ने उसे मारा, क्योंकि वह उनसे दबना नहीं चाहता था। वह दहलीज़ पर सिर रखकर कराहता है: इस घर के सिवा उसका कोई ठिकाना नहीं।
शीर्षक का बड़ा अर्थ. कहानी के अंत में लेखक कहते हैं कि संसार में अनेक 'गूँगे' हैं: जो अन्याय समझते हैं, पर उसका विरोध नहीं कर पाते। चमेली सोचती है: आज कौन है जो गूँगा नहीं है? हर कोई स्नेह और समानता चाहता है, पर कह नहीं पाता।
- कहानी में उसकी तुलना बार-बार पशु से होती है; यह समाज की नज़र है, जिसकी लेखक आलोचना करते हैं। उसके भीतर पूरे मनुष्य जैसी वेदना है।
नया उदाहरण. किसी दफ़्तर में सब जानते हों कि एक कर्मचारी के साथ ग़लत हो रहा है, पर कोई कुछ न कहे, क्योंकि अपनी नौकरी का डर है: बोल सकने वाले भी उस पल 'गूँगे' बन जाते हैं। कहानी का शीर्षक इन्हीं की ओर इशारा करता है।
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