फणीश्वरनाथ 'रेणु' — संवदिया
संवाद जो कहा न गया
हरगोबिन का झूठ, भोजन न कर पाना और रात भर का आत्म-संघर्ष समझाना।
काँटे-से शब्द. गाड़ी में बड़ी बहुरिया के संवाद का हर शब्द उसे काँटे-सा चुभता रहा। कटिहार स्टेशन का भोंपा देखकर उसे लगा, सचमुच सुराज आ गया है।
रुकते पैर. थाना बिंहपुर पहुँचकर उसके पैर बड़ी बहुरिया के मायके के गाँव की ओर बढ़ नहीं रहे थे। उसे लगा: गाँव की लक्ष्मी गाँव छोड़ देगी, तो लोग उसके गाँव पर थूकेंगे।
झूठा जवाब. बड़ी बहुरिया की बूढ़ी माता ने पूछा, क्या संवाद है? हरगोबिन ने कह दिया: कोई संवाद नहीं; बड़ी बहुरिया दशहरे पर मिलने आएगी।
खाना न खा सका. थाली में दाल-भात, भाजी, घी, पापड़ देखकर उसे बथुआ खाती बड़ी बहुरिया याद आ गई। वह कुछ भी न खा सका।
कहा न गया. रात भर वह सोचता रहा कि सुबह सही संवाद सुना देगा। पर सुबह भी वह केवल विदा माँगकर, माँ की दी चूड़ा की पोटली लेकर चल पड़ा। गाँव का मान और बड़ी बहुरिया के प्रति ममता ने संवदिया की ज़बान रोक दी।
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