भीष्म साहनी — गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
सेवाग्राम में गांधी जी
सुबह की सैर, रावलपिंडी वाली बात, आश्रम के लोग और रोगी बालक के प्रसंग समझाना।
सेवाग्राम की ओर. सन् 1938 के आसपास, जिस साल कांग्रेस का हरिपुरा अधिवेशन हुआ, लेखक अपने भाई बलराज (अभिनेता बलराज साहनी) के पास सेवाग्राम गए, जहाँ बलराज 'नयी तालीम' पत्रिका के सह-संपादक थे। वर्धा से इक्के-ताँगे में, अँधेरी, कच्ची सड़क से, वे रात को पहुँचे।
गांधी जी की सैर. अगली सुबह ठीक सात बजे गांधी जी सैर पर निकले। वे बिल्कुल चित्रों जैसे ही लगे। लेखक का परिचय होने पर वे हँसकर बोले: 'इसे भी घेर लिया।' (यानी बलराज ने भाई को भी आश्रम में ले आया)।
रावलपिंडी की याद. रावलपिंडी का नाम सुनकर गांधी जी को अपना वहाँ का दौरा याद आया: 'मैं उन दिनों कितना काम कर लेता था।' उन्होंने वहाँ के प्रसिद्ध बैरिस्टर मिस्टर जॉन का हाल पूछा। साथ चल रहे थे डॉ. सुशीला नय्यर और गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई। गांधी जी इतनी धीमी आवाज़ में, बीच-बीच में हँसते हुए बोलते थे, जैसे अपने आप से बात कर रहे हों।
आश्रम के लोग. आश्रम में लेखक ने कस्तूरबा, एक जापानी भिक्षु, क्रांतिकारी पृथ्वीसिंह आज़ाद (जिन्होंने हथकड़ियों समेत भागती रेलगाड़ी से छलाँग लगाई थी), मीरा बेन, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान और राजेंद्र बाबू को देखा।
बीमार लड़का. एक लड़का ईख का रस ज़्यादा पीकर पेट दर्द से तड़प रहा था। गांधी जी खुद उसके पास आए, उसकी उल्टी करवाई, और हँसते हुए बोले: 'तू तो पागल है।' गांधी जी हर छोटे-बड़े व्यक्ति के प्रति स्नेह और धैर्य से भरे थे। सड़क किनारे रहने वाले तपेदिक के एक मरीज़ का हाल वे हर दिन गुजराती में पूछते थे, मानो उसका इलाज उन्हीं की देखरेख में चल रहा हो।
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