सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' — सरोज स्मृति
देखा विवाह आमूल नवल
सरोज के नववधू रूप, विवाह की सादगी और 'आकाश बदल कर बना मही' का अर्थ समझाना।
बेटी का नया रूप. विवाह के समय कवि ने बेटी का पूरी तरह नया रूप देखा: 'देखा विवाह आमूल नवल'। कलश का शुभ जल, उसकी धीमी मुस्कान, और होंठों पर बिजली-सी कंपन।
लज्जा और प्रकाश. उसकी झुकी हुई आँखों से प्रकाश उतरकर होंठों पर थरथराया। मन में प्रिय (पति) की छवि शृंगार बनकर झलक रही थी।
पहली कविता का शृंगार. कवि को लगा कि उसकी पहली कविता का कल्पना वाला शृंगार, जो उसने अपनी पत्नी के साथ गाया था, अब बेटी के रूप में धरती पर उतर आया है।
सादा विवाह. इस विवाह में न रिश्तेदार आए, न निमंत्रण भेजे गए, न रात-दिन गीत गाए गए। बस एक मौन संगीत था। कवि ने रूढ़ियों को तोड़कर यह विवाह किया।
पिता ही माँ. माँ के न रहने पर, माँ की सारी शिक्षा कवि ने खुद दी, और बेटी की सेज भी खुद सजाई। उसे शकुंतला की विदाई याद आई (जिसे पिता कण्व ने विदा किया था), पर यह कहानी अलग थी। एक गरीब पिता ने स्वयं माँ बनकर बेटी को विदा किया।
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