सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' — सरोज स्मृति
दुख ही जीवन की कथा रही
'वह लता वहीं की' और 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' का अर्थ समझाना।
ननिहाल. विवाह के बाद कुछ दिन रहकर सरोज खुशी से अपनी नानी की गोद में चली गई। वहाँ मामा-मामी ने उसे बादल की तरह प्यार दिया: बिना माँगे, भरपूर।
उसी गोद में. जिस लता (ननिहाल) पर यह कली खिली थी, अंत में उसी गोद में उसने आँखें मूँद लीं: वहीं उसकी मृत्यु हुई।
दुख की कथा. कवि कहता है: बेटी, तू मुझ भाग्यहीन का सहारा थी। 'दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही!' मेरा पूरा जीवन ही दुख की कहानी रहा; आज नया क्या कहूँ?
अडिग पिता. फिर भी वह कहता है: यदि यही धर्म है, तो चाहे मुझ पर वज्रपात हो, मेरा सिर इस पथ पर झुका रहे। मेरे सारे काम शीत ऋतु के कमल की तरह नष्ट हो जाएँ, तो भी मैं कर्तव्य से नहीं हटूँगा।
तर्पण. अंत में पिता अपने सारे पिछले कर्म (पुण्य) बेटी को अर्पित करके उसका तर्पण करता है। बेटी पिता का संबल थी; उसे खोकर पिता के पास केवल तर्पण बचा।
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