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केदारनाथ सिंह — बनारस, दिशा

बनारस: वसंत और धीमी लय

खाली कटोरों में वसंत और 'धीरे-धीरे' की लय का अर्थ समझाना।

वसंत का आना. बनारस में वसंत अचानक आता है। धूल का बवंडर उठता है, शहर की जीभ किरकिराने लगती है, और सब कुछ जाग उठता है।

बदला हुआ शहर. दशाश्वमेध घाट का पत्थर कुछ मुलायम लगने लगता है; बंदरों की आँखों में एक अजीब नमी है; और भिखारियों के खाली कटोरों में भी एक चमक है।

जीवन और मृत्यु. यह शहर रोज़ खुलता है, भरता है, खाली होता है। रोज़ शव अँधेरी गली से निकलकर गंगा की ओर जाते हैं। बनारस में जीवन और मृत्यु साथ-साथ चलते हैं।

धीमी लय. यहाँ धूल, लोग, मंदिरों के घंटे, शाम: सब कुछ धीरे-धीरे होता है। यही धीमी लय (रौ) पूरे शहर को बाँधे रखती है।

सदियों से. गंगा, नाव और तुलसीदास की खड़ाऊँ सदियों से वहीं की वहीं हैं: कुछ भी हिलता नहीं। बनारस अपनी धीमी 'रौ' में चलता है, और यही उसकी स्थिरता है।

बनारस अपनी धीमी 'रौ' में चलता है, और यही उसकी स्थिरता है।

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