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केदारनाथ सिंह — बनारस, दिशा

आधा जल में, आधा मंत्र में

'आधा है और आधा नहीं है' तथा बच्चे के 'उधर-उधर' का अर्थ समझाना।

आधा-आधा शहर. आरती के प्रकाश में अचानक देखो, तो यह शहर आधा जल में, आधा मंत्र में, आधा फूल में, आधा शव में है। यानी गंगा, पूजा, श्रद्धा और मृत्यु, सब इसमें घुले हैं।

बिना खंभे के. जो है, वह जैसे बिना खंभे के खड़ा है। और जो नहीं है, उसे राख, रोशनी, आग, पानी, धुएँ और उठे हुए हाथों के खंभे थामे हुए हैं।

एक टाँग पर. यह शहर किसी अनदेखे सूरज को अर्घ्य देता हुआ, एक टाँग पर गंगा में खड़ा है, अपनी दूसरी टाँग से बेखबर: एक तपस्वी जैसा, आध्यात्मिक भी और लौकिक भी।

'दिशा'. दूसरी कविता में कवि ने पतंग उड़ाते एक बच्चे से पूछा, 'हिमालय किधर है?' बच्चे ने उधर इशारा कर दिया जिधर उसकी पतंग उड़ रही थी।

बच्चे से सीख. कवि मानता है कि उसने पहली बार जाना कि हिमालय किधर है: बच्चे के लिए उसकी दिशा वही है जहाँ उसकी पतंग है। बच्चों की सहज दृष्टि में भी गहरा सच है, और उनसे भी सीखा जा सकता है।

बनारस दिखता भी है और रहस्य भी है; बच्चे की सहज दृष्टि में भी गहरा सच है।

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