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तुलसीदास — भरत-राम का प्रेम, पद

भरत-राम का प्रेम

भरत के कथनों से राम का स्वभाव और भरत की आत्मग्लानि समझाना।

प्रसंग. राम के वन जाने के बाद भरत उन्हें लौटाने चित्रकूट जाते हैं। वहाँ सभा में भरत पुलकित होकर खड़े हुए; उनकी कमल-सी आँखों में प्रेम के आँसू भर आए।

राम का स्वभाव. भरत कहते हैं: राम अपराधी पर भी क्रोध नहीं करते। बचपन में खेल में भी वे कभी नाराज़ नहीं हुए; वे खुद हारकर भी मुझे जिताते रहे।

विधाता की ईर्ष्या. पर विधाता यह दुलार सह न सका, और माता (कैकेयी) के बहाने हमारे बीच बाधा डाल दी।

अपना ही दोष. भरत कहते हैं: क्या कोदो (मोटा अनाज) की बाली में धान लगता है? क्या घोंघा (सीप जैसा जीव) मोती देता है? यानी मुझ जैसे से अच्छा क्या होगा। वे सारा दोष अपने भाग्य पर लेते हैं।

भरत की ग्लानि. पिता की मृत्यु, माताओं और नगरवासियों का दुख, राम का पैदल वन जाना: भरत यह सब अपने कारण मानते हैं। उनकी इस ग्लानि में उनका निर्मल प्रेम और महानता दिखती है।

भरत की ग्लानि में उनका निर्मल प्रेम और महानता दिखती है।

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