घनानंद — कवित्त
कूकभरी मूकता
आनाकानी, मौन का प्रण, 'कूकभरी मूकता' और 'रुई दिए रहौगे' समझाना।
आरसी में अपना मुँह. कवि सुजान से पूछता है: कब तक आनाकानी करके आरसी (शीशे) में अपना ही मुँह देखती रहोगी? क्या मेरी दशा पर तुम्हारी नज़र नहीं जाएगी?
चुप्पी का जवाब. मैं भी चुप रहकर देखूँगा कि तुम अपना प्रण (न बोलने का) कब तक निभाती हो।
कूकभरी मूकता. मेरी कोयल-सी पुकार भरी चुप्पी (कूकभरी मूकता) खुद तुम्हें बुलाकर बोलने को मजबूर करेगी। यहाँ चुप्पी और पुकार एक साथ हैं: यह विरोधाभास है।
होड़. हमारे बीच एक होड़ लगी है; देखेंगे, किसकी टेक (ज़िद) टलती है।
कानों में रुई. कब तक कानों में रुई डालकर बहरी बनी रहोगी? कभी तो मेरी पुकार तुम्हारे कान खोलेगी। सच्चे प्रेम की मौन पुकार भी अंत में सुनी जाती है: यही कवि का विश्वास है।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.