नमक का दारोगा
अंत: अलोपीदीन का प्रस्ताव
कहानी के अंत, संदेश और भाषा को समझाना।
अलोपीदीन का आना. एक सप्ताह बाद अलोपीदीन सजे हुए रथ पर वंशीधर के घर आते हैं। पिता झुककर उनकी लल्लो-चप्पो करते हैं और बेटे को 'अभागा कपूत' कहकर कोसते हैं। वंशीधर समझते हैं कि वे बदला लेने या अपमान करने आए हैं।
हार की स्वीकृति. पर अलोपीदीन कहते हैं: मैंने हज़ारों अमीरों और अफ़सरों को अपने धन का गुलाम बनाया, पर हारा तो केवल तुमसे।
प्रस्ताव. वे वंशीधर को अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियुक्त करते हैं: छह हज़ार वार्षिक वेतन, रोज़ का ख़र्च अलग, सवारी के लिए घोड़े, रहने को बंगला, नौकर-चाकर।
- वंशीधर विनम्रता से कहते हैं कि वे इस पद के योग्य नहीं। अलोपीदीन हँसकर कहते हैं: 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही ज़रूरत है।' उन्हें विद्वता नहीं, न बिकने वाली ईमानदारी चाहिए।
- वंशीधर की आँखें भर आती हैं, और वे काँपते हाथों से कागज़ पर दस्तख़त कर देते हैं।
संदेश. धन पर धर्म (ईमानदारी) की जीत: यही आदर्शोन्मुख यथार्थवाद है। भ्रष्ट व्यवस्था का पूरा सच दिखाने के बाद, अंत आदर्श पर।
भाषा. मुहावरे (पौ-बारह होना, फूले न समाना), हिंदी-उर्दू का मेल (बेमुरौवत, मुअत्तल, धर्मनिष्ठ) और चित्रात्मक वर्णन कहानी को जीवंत बनाते हैं।
नया उदाहरण. कोई बड़ी कंपनी उस ऑडिटर को नौकरी पर रख ले जिसने कभी उसी कंपनी की गड़बड़ी पकड़ी थी: जो किसी के दबाव में नहीं आया, वही अपनी तिजोरी का सबसे भरोसेमंद रखवाला है।
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