मियाँ नसीरुद्दीन
कृष्णा सोबती और शब्दचित्र
लेखिका, शब्दचित्र विधा और पाठ की शुरुआत समझाना।
लेखिका. कृष्णा सोबती (सन् 1925-2019) का जन्म गुजरात (पश्चिमी पंजाब, अब पाकिस्तान में) में हुआ। वे मानती थीं कि 'कम लिखना विशिष्ट लिखना है'; इसी संयमित लेखन ने उन्हें अलग पहचान दी।
- रचनाएँ: उपन्यास 'ज़िंदगीनामा', 'दिलोदानिश', 'ऐ लड़की', 'समय सरगम'; कहानियाँ 'मित्रो मरजानी', 'डार से बिछुड़ी'; शब्दचित्र-संस्मरण 'हम-हशमत', 'शब्दों के आलोक में'। उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान और हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान मिला।
- उन्होंने मित्रो, शाहनी, हशमत जैसे यादगार पात्र दिए। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ तत्समता, उर्दू का बाँकपन और पंजाबी की ज़िंदादिली, तीनों एक साथ मिलते हैं।
शब्दचित्र. शब्दचित्र में किसी व्यक्ति का रूप, स्वभाव, बोली और अंदाज़ ऐसे लिखा जाता है कि वह आँखों के सामने खड़ा हो जाए। यह पाठ 'हम-हशमत' संग्रह से है।
मुलाक़ात. एक दुपहरी लेखिका जामा मस्जिद के पास मटियामहल के गढ़ैया मुहल्ले में एक मामूली अँधेरी-सी दुकान पर आटे का ढेर सनते देख रुक जाती हैं। यह खानदानी नानबाई (रोटियाँ बनाने-बेचने वाले) मियाँ नसीरुद्दीन की दुकान है, जो छप्पन किस्म की रोटियों के लिए मशहूर हैं।
पहली झलक. मियाँ चारपाई पर बैठे बीड़ी पी रहे हैं: मौसमों की मार से पका चेहरा, आँखों में काइयाँ (चालाक) भोलापन, माथे पर मँजे हुए कारीगर के तेवर। वे 'पंचहज़ारी अंदाज़' (बड़े सरदार जैसी शान) से सिर हिलाकर समय देने को राज़ी होते हैं, फिर पूछते हैं कि कहीं वे अखबारनवीस (पत्रकार) तो नहीं।
नया उदाहरण. कोई अपने गाँव के बूढ़े कुम्हार के बारे में लिखे: 'मिट्टी सनी उँगलियाँ, चाक पर झुकी पीठ, और हर बात के बाद एक धीमी हँसी': पढ़ने वाले को कुम्हार दिखने लगे, तो वह शब्दचित्र है।
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