मियाँ नसीरुद्दीन
खानदानी हुनर और 'तालीम की तालीम'
हुनर सीखने के बारे में मियाँ के विचार समझाना।
इल्म कहाँ से? लेखिका पूछती हैं कि तरह-तरह की रोटी पकाने का इल्म (ज्ञान) कहाँ से मिला। मियाँ आँखों के कंचे फेरकर (घूरकर) कहते हैं: नानबाई इल्म लेने क्या नगीनासाज़, आईनासाज़, मीनासाज़, रँगरेज़ या तेली-तंबोली के पास जाएगा? यह तो खानदानी पेशा है।
तीन पीढ़ियाँ. जो सीखा, वालिद (पिता) से सीखा, और उनके मरहूम (स्वर्गीय) होने पर उन्हीं के ठीये (जगह) पर आ बैठे।
- पिता: मियाँ बरकत, 'शाही नानबाई गढ़ैयावाले'।
- दादा: 'आला नानबाई' मियाँ कल्लन।
- मियाँ नसीरुद्दीन इस पेशे की तीसरी पीढ़ी हैं।
करके सीखना. कोई नसीहत याद है? मियाँ का जवाब: 'काम करने से आता है, नसीहतों से नहीं।'
तालीम की तालीम. मियाँ समझाते हैं कि मदरसे में बच्चा कच्ची, पक्की, दूसरी जमात छोड़कर सीधे तीसरी में बैठ जाए तो छूटी पढ़ाई कहाँ जाएगी? वैसे ही उन्होंने पहले बर्तन धोना, भट्टी बनाना और भट्टी को आँच देना सीखा, और खोमचा भी लगाया, तब नानबाई बने। निचोड़: 'तालीम की तालीम भी बड़ी चीज़ होती है', यानी सीखने का ढंग और क्रम भी सीखना पड़ता है।
नया उदाहरण. कोई दर्ज़ी का बेटा सीधे सूट काटना चाहे, पर पिता पहले उससे बटन टँकवाएँ, फिर तुरपाई करवाएँ, फिर नाप लेना सिखाएँ: छोटे काम ही बड़े हुनर की नींव हैं।
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