मियाँ नसीरुद्दीन
बादशाह, कहावत और मियाँ का मिज़ाज
मियाँ के स्वभाव के रंग समझाना।
बादशाह की फ़रमाइश. मियाँ गर्व से सुनाते हैं: बादशाह सलामत ने उनके बुज़ुर्गों से कहा, 'कोई ऐसी चीज़ बनाओ जो न आग से पके, न पानी से बने।' वह चीज़ बनी, बादशाह ने खूब खाई और सराही। पर वह क्या थी, यह मियाँ 'न बतावेंगे'।
कहावत. 'खानदानी नानबाई कुएँ में भी रोटी पका सकता है', और मियाँ के अनुसार यह कहावत उनके बुज़ुर्गों के करतब पर ही पूरी उतरती है।
नाम पर खीज. किस बादशाह के यहाँ काम करते थे? मियाँ कहते हैं, 'क्यों बाल की खाल निकालने पर तुले हैं!' लेखिका बहादुरशाह ज़फ़र का नाम लेती हैं, तो वे बस 'बादशाह सलामत' लिख लेने को कहते हैं: आपको कौन-सी चिट्ठी भेजनी है!
छिपा दुख. लेखिका बेटे-बेटियों के बारे में पूछना चाहती हैं, पर मियाँ के चेहरे पर 'किसी दबे हुए अंधड़ के आसार' देखकर यह मज़मून (विषय) नहीं छेड़तीं। वे सत्तर के हो चुके हैं; पिता अस्सी पर गुज़रे थे।
कारीगर और रोटियाँ. बब्बन मियाँ उनके कारीगर हैं, जिन्हें वे 'गिन के मजूरी' देते हैं: दो रुपये मन आटे की, चार रुपये मन मैदे की। रोटियों के नाम: बाकरखानी, शीरमाल, ताफ़तान, बेसनी, खमीरी, रूमाली, गाव-दीदा, गाज़ेबान, तुनकी; तुनकी पापड़ से भी महीन होती है।
अंतिम आह. 'उतर गए वे ज़माने। और गए वे कद्रदान जो पकाने-खाने की कद्र करना जानते थे!' अब तो बस तंदूर से निकाली, निगली और हज़म।
नया उदाहरण. कोई पुराना हलवाई ग्राहक से कहे 'हमारे दादा की जलेबी राजा साहब मँगाते थे', और पूछने पर कि कौन-से राजा, बस मुस्कुराकर कहे 'अरे, राजा साहब ही!': गर्व और थोड़ी-सी शेखी, दोनों साथ।
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