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मीरा — मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई

पद: मेरे तो गिरधर गोपाल

पद के पहले भाग का अर्थ समझाना।

पद का स्रोत. यह पद नरोत्तम दास स्वामी द्वारा संपादित 'मीराँ मुक्तावली' से लिया गया है। इसमें मीरा कृष्ण के प्रति अपनी अनन्यता (किसी और को न मानना) बताती हैं, और व्यर्थ के कामों में उलझे लोगों पर दुख प्रकट करती हैं।

'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'. मेरे तो बस गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं।

  • गिरधर: गिरि (पर्वत) को धारण करने वाले; कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था।
  • गोपाल: गायों का पालन करने वाले।

'जा के सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई'. जिनके सिर पर मोर-पंख का मुकुट है, वही मेरे पति हैं। मीरा कृष्ण की उपासना पति (प्रियतम) के रूप में करती हैं: माधुर्य भाव की भक्ति।

'छांड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई?' मीरा ने कुल की मर्यादा छोड़ दी है।

'संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोयी'. संतों के पास (ढिग) बैठ-बैठकर मीरा ने लोक-लाज खो दी। एक राजघराने की स्त्री का साधुओं के बीच बैठना उस समय 'लाज' के ख़िलाफ़ माना जाता था; मीरा ने इसकी परवाह नहीं की।

शब्द. कानि (मर्यादा, कुल की इज़्ज़त), ढिग (पास), सोई (वही), दयी (दी), खोयी (खो दी)।

नया उदाहरण. कोई खिलाड़ी कहे 'मेरे लिए तो बस खेल है, बाकी सब बाद में', और दोस्तों की पार्टी, फ़िल्में, आराम, सब छोड़कर रोज़ सुबह मैदान पहुँचे: एक लक्ष्य के प्रति ऐसी ही अनन्यता।

एक कृष्ण, दूसरा न कोई।

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