मीरा — मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
प्रेम-बेलि, मथनी और जगत
पद के दूसरे भाग का भाव और शिल्प समझाना।
प्रेम-बेलि. 'अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोयी / अब त बेलि फैलि गयी, आणंद-फल होयी': मीरा ने आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई; अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगने लगे हैं।
- यह सांगरूपक है: प्रेम को बेल माना और उसके सारे अंग (बोना, सींचना, फैलना, फल) भी रूपक में बाँध दिए।
- आँसू = विरह की वेदना; आनंद-फल = कृष्ण-भक्ति का सुख।
मथनी. 'दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से विलोयी / दधि मथि घृत काढ़ि लियो, डारि दयी छोयी': मीरा ने दूध की मथानी से बड़े प्रेम से बिलोया (मथा), दही मथकर घी निकाल लिया और छाछ फेंक दी।
- यहाँ घी = जीवन का सार (भक्ति), और छाछ = बाकी बचा हुआ हिस्सा।
भक्त और जगत. 'भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी': भक्तों को देखकर मीरा प्रसन्न होती हैं, और संसार को देखकर रोती हैं, क्योंकि लोग व्यर्थ के कामों और मोह-माया में उलझे हैं।
प्रार्थना. 'दासि मीरां लाल गिरधर! तारो अब मोही': अंत में मीरा ख़ुद को दासी कहकर लाल गिरधर से प्रार्थना करती हैं: अब मेरा उद्धार करो (तारो)।
शिल्प.
- पुनरुक्ति: सींचि-सींचि, बैठि-बैठि: शब्द दोहराकर भाव पर ज़ोर।
- अनुप्रास: 'गिरधर गोपाल', 'मोर-मुकुट': एक ही वर्ण की आवृत्ति।
- विरोध: 'राजी हुयी' और 'रोयी' आमने-सामने।
- तुक और गेयता: कोई, सोई, खोयी, बोयी, होयी, विलोयी, रोयी, मोही: हर पंक्ति का अंत '-ओई' की ध्वनि पर।
- भाषा: राजस्थानी मिली ब्रज (आणंद, दयी, हुयी)।
नया उदाहरण. किसी किताब को पढ़कर उसके ज़रूरी विचार नोटबुक में उतार लेना, और बाकी भराव वाली बातें छोड़ देना: पढ़ाई में भी 'मथकर सार निकालना' काम आता है।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.