घर की याद
बारिश में तिरता घर
कविता के पहले भाग का भाव समझाना।
बारिश और मन. 'आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है': बाहर रात भर बारिश हो रही है, और भीतर कवि का मन यादों से घिरता जा रहा है। बाहर का पानी और भीतर की उदासी, दोनों साथ बढ़ते हैं।
ख़ुशी से भरा घर. घर कवि से दूर है, पर 'खुशी का पूर' (ख़ुशियों से भरा) है।
- चार भाई, चार बहिनें: 'भुजा भाई प्यार बहिनें': भाई भुजाओं जैसे (ताक़त, सहारा), बहनें प्यार जैसी।
- इन दिनों एक बहन मायके आई है। वह ख़ुशी से पिता के घर आई, पर भाई को वहाँ न पाकर घर उसके लिए 'परिताप का घर' (दुख का घर) बन गया है।
बिन-पढ़ी माँ. 'और माँ बिन-पढ़ी मेरी, दुःख में वह गढ़ी मेरी': माँ पढ़ी-लिखी नहीं है; दुख ने ही उसे गढ़ा है।
- माँ की गोद में सिर रख लो, तो फिर कोई दुख नहीं रहता।
- उसकी स्नेह-धारा जेल तक पहुँचती है, पर उसे लिखना नहीं आता, इसलिए कवि को उसका पत्र नहीं मिलता।
पिता: बुढ़ापा छू न सका. 'पिता जी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा':
- आज भी दौड़ जाएँ, खिलखिला उठें; मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें (डरें)।
- 'बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता': आवाज़ में बादल की गरज, काम में आँधी जैसी तेज़ी।
- रोज़ गीता-पाठ, दो सौ साठ दंड, मुगदर हिलाना।
'पाँचवें का नाम लेकर'. कवि सोचता है: आज यह सब करके नीचे आए होंगे तो पिता की आँखें भर आई होंगी, और वे पाँचवें बेटे का नाम लेकर रो पड़े होंगे। 'पाँचवाँ मैं हूँ अभागा': वही बेटा जिसे पिता 'सोने पर सुहागा' कहते थे। आज उन्हें अपने बाकी 'स्वर्ण बेटे' भी 'हेटे' (कम, फीके) लगे होंगे, क्योंकि उनका सुहागा (कवि) बँधा बैठा है।
नया उदाहरण. किसी दिन बहुत तेज़ बारिश में अकेले कमरे में बैठे-बैठे किसी को अपने बचपन का आँगन, कागज़ की नावें और गरम पकौड़े याद आने लगें: बाहर का मौसम भीतर की यादें खोल देता है।
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